ठहरे हुए पानी में…

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प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
विख्यात कवयित्री माया गोविंद जी द्वारा लिखित एक बेहद लोकप्रिय गीत है— ‘ठहरे हुए पानी में कंकर न मार सांवरे…’। उस दौर के हम जैसे अनेक युवाओं की जुबां पर सबसे ज्यादा गुनगुनाया जाने वाला यह गीत आज अचानक याद आ गया। कमाल की बात यह है कि यह लोकप्रिय गीत फि़ल्म दलाल का है जिसे मिथुन चक्रवर्ती पर फिल्माया गया है। अधेड़ हो चुकी उम्र में इस गीत के मुखड़े का आज स्मरण होने की वजह मध्य प्रदेश की ताजा राजनीतिक हलचल है। राज्य सभा की तीसरी सीट के लिए भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश से एक और प्रत्याशी खड़ा कर, शांत पड़े राजनीतिक माहौल में यकायक हलचल मचा दी है। हालांकि भाजपा इससे पहले भी दो मर्तबा इस प्रकार की कोशिश कर चुकी है, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और हेमंत खंडेलवाल कुछ ज्यादा ही आशान्वित दिखाई दे रहे हैं। इस भारी उम्मीद की वजह भी स्पष्ट है। मीनाक्षी नटराजन के उम्मीदवार घोषित होते ही प्रदेश कांग्रेस के भीतर एक अजीब सी छटपटाहट देखने को मिल रही है। कुछ कांग्रेसी नेता तो सोशल मीडिया के माध्यम से अपने अंतर्मन के भावों की अभिव्यक्ति भी कर चुके हैं। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदान के वक्त ‘अंतरात्मा की आवाज’ कितने कांग्रेस विधायकों के ईमान को झकझोर पाती है वैसे भी अंतरात्मा की आवाज को सुनने के एवज में किसी नुकसान का खतरा भी दिखाई नहीं देता । नए संसदीय विज्ञान ने यह भी बता दिया है । दो साल के आसपास हो गए बीना विधायक निर्मला सप्रै तकनीकी रूप से आज भी कांग्रेस की ही विधायक हैं।यह अलग है कि उनकी योग्यता/अयोग्यता को लेकर विधानसभा अध्यक्ष और और अदालतों में निर्णय किया जाना शेष है। लिहाजा व्हिप उल्लंघन जैसे मामले अब निश्तेज ही हो चुके हैं । दरअसल, इस पूरी हलचल के लिए खुद कांग्रेस ही जिम्मेदार दिखाई देती है। जो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं, वे विधायक दल के नेता नहीं हैं और जो विधायक दल के नेता हैं, वे संगठन में हाशिए पर हैं। अजय सिंह पूरे प्रदेश की परिक्रमा कर चुके हैं, लेकिन यह यात्रा राहुल गांधी या कांग्रेस को मजबूत करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सियासी जमीन का बंदोबस्त करने के लिए थी। कमलनाथ की सियासी हसरतें भी कुलांचे मार रही थीं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, कांतिलाल भूरिया और अरुण यादव भी कतार में ही खड़े रह गए। राजनीति के उस्ताद दिग्विजय सिंह ने मौके की नजाकत को भांपकर पहले ही इस पूरे परिदृश्य से किनारा कर लिया। जाहिर है, जब एक ही पार्टी के अंदर इतनी मतभिन्नता हो तो संदेह का लाभ उठाने के लिए भाजपा द्वारा शतरंज की राजनीतिक बिसात पर चली गई ढाई घर की पहली चाल ही खलबली मचाने के लिए पर्याप्त है। रविवार देर रात महेश केवट की चाल चलकर सत्ताधारी पार्टी ने राजा, रानी, वजीर, ऊंट, घोड़े और न जाने कितने प्यादों को निशाना बनाया है। लेकिन इतना तो तय है कि जैसा तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था—’हम राजनीतिक दल हैं, मंजीरे थोड़ी बजाएंगे’ फिर याद कीजिए कोई छह माह पहले जबलपुर के आदिवासी सम्मेलन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कांग्रेस के वरिष्ठ आदिवासी विधायक को दिया गया वो आमंत्रण—’भले व्यक्ति हो, उधर क्यों बैठे हो हमारी तरफ आ जाओ।’ यह कोई सहसा निकला मजाक का शब्द नहीं था, बल्कि इसकी गूढ़ भावना को अब समझा जा सकता है। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि राज्यसभा चुनाव कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट साबित होगा। कांग्रेस अपने विधायकों की लाख चाहे बाड़ेबंदी कर ले, लेकिन पटकथा बहुत पहले ही लिखी जा चुकी है। संभव है कि भाजपा तीसरे उम्मीदवार को भले ही जिताने में सफल न हो पाए और कुछ वोट कम रह जाएं, लेकिन उनका होमवर्क पूरा ही किया गया होगा। अन्यथा अपनी जगहंसाई कराने के लिए और केवल ठहरे हुए पानी में कंकर फेंकने के लिए ही इतना बड़ा सामूहिक निर्णय नहीं लिया गया होगा। क्योंकि अख्तर नज़मी ने लिखा था- “वो ज़हर देता तो सब की निगाह में आ जाता सो ये किया कि मुझे वक्त पे दवाएँ न दीं।”