नई दिल्ली (मध्य स्वर्णिम): यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिश्नर के नए नोटिफिकेशन को लेकर विवाद शुरू हो गया है। ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय में यूजीसी की नई गाइडलाइंस को चुनौती देते हुए जाति आधारित भेदभाव का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि ने कुछ चुनिंदा जातियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है, जो समावेशी विकास की परिभाषा से बिल्कुल विपरीत है। यूजीसी ने हाल ही में एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, नोटिफिकेशन के नियम 3(सी) के तहत यूजीसी अनाश्रित अभ्यर्थियों और शिक्षकों को संरक्षण देने में नाकामयाब साबित हुआ है। विनीत जिंदल नाम के व्यक्ति ने यूजीसी के इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठाई है। विनीत का आरोप है कि यूजीसी जाति आधारित भेदभाव कर रही है। यूजीसी की परिभाषा में जाति आधारित भेदभाव सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणी के साथ ही होता है और जनरल कैटेगरी वाले अभ्यर्थियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है।
सरकार का तर्क:
सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा में ओबीसी छात्रों को भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें सुरक्षा देना जरूरी है। बता दें कि इस संबंध में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने सिफारिश की थी। उसी सिफारिश के आधार पर ओबीसी को भी इस दायरे में लाया गया है।




