भोपाल (मध्य स्वर्णिम) अंदर की खबर: पूरे मध्यप्रदेश में इन दिनों निजी विद्यालयों की मनमानी बदस्तूर जारी है। विद्या दान की भावना के साथ शुरू किए गए स्कूल अब विद्या बेचने के एकमात्र लक्ष्य पर चल रहे हैं। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की पालकों की कमजोरी का निजी स्कूल बेजा दोहन कर रहे हैं। आलम यह है सरकार की नाक के नीचे राजधानी में ही निजी स्कूल और पब्लिशर मोटी कमाई की चांदी काट रहे हैं। दरअसल, सीबीएससी से मान्यता प्राप्त इन स्कूलों में एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम के संचालन की बाध्यता होती है। बाध्यता तो यह भी है कि स्कूल एनसीईआरटी की किताबें ही पढ़ाएं। लेकिन व्यावसायिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो चुके निजी विद्यालय नियमों को धत्ता बताकर अपनी अनैतिक कमाई का रास्ता निकाल रहे हैं। निजी विद्यालय के अभिभावकों को पुस्तक क्रय करने की लिस्ट थमाई जा रही है, उसमें बाकायदा पब्लिशर का नाम होता है। साथ ही दुकान का पता भी क्लास टीचर बता देते हैं। आमतौर पर वही किताब एनसीआरटी के द्वारा 65 रुपए में बेची जाती है, जिसे अभिभावक 640 रुपए में खरीदने को मजबूर है। मध्य स्वर्णिम अपने पाठकों के लिए यहां एक निजी विद्यालय द्वारा प्रेषित लिस्ट प्रकाशित कर रहा है जिसमें विषयवार पब्लिशर का नाम भी शामिल है। ऐसा नहीं है कि इसकी भनक सरकार या स्थानीय प्रशासन को नहीं है। पालकों यह पीड़ा पिछले कई वर्षों से सामने आ रही है। लेकिन कार्रवाई नहीं किए जाने के पीछे की मजबूरी समझ से परे है।
व्यवस्था का ही दोष है:
पालकों का निजी विद्यालयों के सामने नतमस्तक होने के पीछे सरकारी मंशा ही है। आमतौर पर अभिभावक अपने छोटे बच्चों को पढ़ाई के लिए निवास के आसपास के ही स्कूल का चयन करते हैं।अब सरकारी स्कूलों की दुर्दशा तो किसी से छिपी नहीं है।लिहाजा , पालकों के सामने निजी विद्यालय ही मजबूरी का विकल्प बचता है।और इसी मजबूरी का फायदा निजी स्कूल संचालक उठा रहे हैं।प्रवेश देते समय नैतिकता की लंबी चौड़ी शब्दजाल से भ्रमित किया जाता है। प्रवेश ले लेने के बाद ही ऐसे विद्यालयों का वास्तविक चरित्र सामने आता है।
‘दीपक’ की रोशनी की काफी है:
निजी विद्यालयों के संगठित लूट पर पूरे प्रदेश में एकमात्र प्रभावी कार्रवाई जबलपुर में की गई थी।तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना ने इस गठजोड़ का केवल भंडाफोड़ किया था ,अपितु इस लूट पर काफी हद तक अंकुश भी लगवाई थी।सक्सेना ने तब जबलपुर के 65 निजी विद्यालयों को घुटने पर लाने मजबूर कर दिया था।मतलब साफ है,कानूनन प्रावधान है इस माफिया के खिलाफ।लेकिन इच्छा शक्ति का अभाव है स्थानीय प्रशासन में।अब हर जिले के कलेक्टर को मुख्यमंत्री तो फोन लगाकर नहीं कहेंगे,अफसरशाही को भी अपनी जिम्मेदारी से दो चार होना पड़ेगा,तभी अभिभावकों की जेब में होने वाली डकैती रुकेगी।




