पटवारी जी…. कान देखिए !

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बतकही (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
बड़े बुजुर्ग पहले जल्दबाजी में लिए फैसले पर एक लोकोक्ति कहते थे,कान देख लो कौवा के पीछे मत भागो।मध्यप्रदेश कांग्रेस के जुझारू अध्यक्ष आजकल बड़े बुजुर्गों की इस कहावत में तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनको कान देखना है या कौवों के पीछे भागना है।हालांकि विधानसभा चुनाव बुरी तरीके से हारने के बाद,रणछोड़ नेताओं की लंबी फेहरिस्त बनी। फिर जो बचे वो दागी,बागी, अभागी ही साबित हो रहे हैं। कांकड़ – पाथर जोड़ के पटवारी अपने लिए आगामी समय में पॉलिटिकल प्लॉट बना रहे हैं,लेकिन चयनित विधायकों के पुराने कारनामों की वजह से धड़ाधड़ विकेट गिर रहे हैं। एक अंदेशा यह भी है कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी एकमात्र खाली हो रही सीट भी शायद ही बचा पाए। विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा का मसला अभी पूरी तरह से मसल भी नहीं पाया कि राजेंद्र एक ऐसे कारनामे में लिप्त होकर सजायाफ्ता हो गए जिसकी कल्पना कोई भी ‘भारती ‘ नहीं करेगा।मुकेश मल्होत्रा और राजेंद्र भारती खुद कानून के जानकार हैं, वो अगर ऐसी गलतियां कर रहे हैं,तो इसमें भाजपा का दोष कहां है ? फिर बीजेपी एक राजनैतिक दल है ,कांग्रेस की तरह एनजीओ थोड़ी है जो झांझ – मजीरा लेकर बजाएगी। निश्चित तौर कानून सम्मत व्यवस्था के अंतर्गत सदस्यता समाप्ति की कार्रवाई करने का विधानसभा सचिवालय को नैतिक अधिकार है।यह अधिकार भी उच्चतम न्यायालय ने दिया है और उसके परिपालन में प्रदेश के लोकतंत्र का मंदिर यदि रात में खुलता तो इसमें क्या बुराई है? इस देश में कई बार न्यायपालिका आधी रात को खोली गई है नियम से विरुद्ध हटकर।कानून कहता है कि यदि किसी विधायक को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा सुना दी जाती है तो वह स्वत: ही सदस्यता से अयोग्य हो जाता है। एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रादेशिक मुखिया होने के नाते शायद इस बात की जानकारी जीतू पटवारी को भी होगी ही। कहीं ऐसा तो नहीं कि कौवा कान ले गया के चक्कर में पटवारी जी, आपने अपनी सीमारेखा लांघ दी? विधानसभा परिसर में अचानक पहुंचकर, दबाव बनाते हुए आपने काम में बाधा डालने की कोशिश की! संभव है आप पर कोई कार्रवाई भी प्रचलित कर दी जाए ! ये स्पीकर महोदय के विवेवाधिकार पर निर्भर करता है।जीतू पटवारी भूल जाते हैं कि वे एक प्रमुख राजनैतिक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं,कोई एक्टिविस्ट नहीं। लेकिन, आपसी प्रतिद्वंदिता की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में आगे निकल जाने की होड़ में राजनैतिक मर्यादाओं को तार- तार कर रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष से पटवारी की शीत युद्ध को कौन नहीं जानता? कहीं इस मुद्दे को सिंगार, उमंग में न लपक लें इसलिए तो जल्दबाजी नहीं की? वैसे एक उमंग हों तो भी बात अलग है। गुरुवार को ही पटवारी के नाथ ,कमल और मोदी की पिच पर बैटिंग कर रहे थे।उन्होंने यह कहकर आरोपों के गुब्बारे की हवा निकाल दी कि एलपीजी संकट नहीं है ,इसका हौवा खड़ा किया जा रहा है ।जाहिर है ,इतने बड़े कद और पद का व्यक्ति इस ‘अवस्था’ में जो बोलेगा वो सच ही बोलेगा(अवस्था से मेरा आशय उनकी उम्र को लेकर कतई नहीं है) ।अब ऐसे में आलाकमान से सूबा जिता देने की सुपारी लेकर आए जीतू पटवारी को कुछ ज्यादा सूझ नहीं रहा है।फिर आम कार्यकर्ता भी अब आरोप लगाने लगे हैं कि प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय नहीं पटवारी कांग्रेस हावी हो रही है। हमे तो अपनों ने लूटा ,गैरों में कहां दम था की मार झेल रहे प्रदेश कांग्रेस के जुझारू अध्यक्ष के पास कान और कौवा दोनों को देखने का ही लालच भी है और मजबूरी भी। सबसे युवा विधायक हेमंत कटारे से लेकर सबसे अनुभवी (वृद्ध नहीं)कमलनाथ तक जीतू पटवारी की मेंड़ को बिना पूर्व सूचना के ढहाने में लगे हों तो ऐसे मौकों पर विचलन स्वाभाविक है।अच्छा मुकेश नायक ,जिन्हे मीडिया विभाग का अध्यक्ष बनाया गया वो भी त्यागपत्र दे चुके हैं। (बाद में वापस मनाया गया ) उपनेता प्रतिपक्ष के पद से कटारे भी अपना स्तीफा सोशल मीडिया के माध्यम से दे चुके हैं। इन सब के बीच एक मजबूत विपक्ष के लिए जरूरी है विपक्षी दल का नेता मजबूत दिखे न कि जज्बातों में बहकर विरोध की मानसिकता के साथ मजबूर। अभी प्रदेश में विधानसभा चुनाव में लगभग ढाई साल का वक्त बचा है। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में जीतू पटवारी की स्थिति पर ग़ालिब का यह शेर ही लिखा जाना उचित होगा- ‘उम्र भर ग़ालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पर थी और आईना साफ़ करता रहा’