जन गण का तंत्र, सद्भाव ही महामंत्र

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विशेष संपादकीय (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
किसी भी गणराज्य में जन ही राष्ट्र शक्ति है। भारत भाग्य विधाता का आशय ही हमारे देश की बहुवर्णी संस्कृति,लोग,सभ्यताएं और मान्यताएं हैं,जो इस विशालकाय भू-भाग को अपनी विविधता के बावजूद एकाकार किए हुए है।जब से मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव हुआ है,भारतीय संस्कृति तभी से अस्तित्व में है, ऐसा कई बार प्रमाणित हो चुका है। द्वापर,त्रेता,सतयुग या सिंधु सभ्यता हो इतने लंबे कालखंड की लिखित या वर्णित या लोक श्रुतियां शायद ही किसी अन्य गणराज्य के पास उपलब्ध है।आक्रांताओं के बार-बार आक्रमणों और सभ्यता को तहस- नहस कर देने के मंसूबों के बावजूद भी हमारी संस्कृति और इतिहास के साथ सभ्यता खुद को बचाते हुए आगे बढ़ते रही।मुगलों के बाद अंग्रेजों की कथित गुलामी के लंबे कालखंड में भी इसी जीवंत भारतीय संस्कृति के दम पर स्वघोष के साथ आजादी का अंगीकार किया। 15 अगस्त 1947 भारत के लिखित इतिहास का स्वर्णिम दिन था। उपनिवेश के बेडिय़ों को तोड़कर देश स्वाभिमान के साथ खड़ा हुआ। 26 जनवरी 1950 में लिखित संविधान को स्वीकार कर हम संप्रभु संपन्न गणराज्य बन गए।यदि भारत ने दु:ख और तपस्या की आग में गुजरने जितना धीरज दिखाया और अपनी सभ्यता पर- जो अपूर्ण होते हुए भी अभी तक काल के प्रभाव को झेल सकी है- किसी भी दिशा से कोई अनुचित आक्रमण न होने दिया, तो वह दुनिया की शांति और ठोस प्रगति में स्थायी योगदान कर सकती है। देश की सबसे बड़ी ताकत इसके गण हैं। जिनकी संख्या अब 140 करोड़ से ऊपर गिनी जा रही है। लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ा प्रकृति का उपहार इसकी युवा जनसंख्या ही है। देश में तीस फ़ीसदी से ज्यादा 18 से 30 वर्ष के युवा निवास करते हैं। नई वर्तनी में इन्हे ही जेन-जी के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा है। आज ज्यादातर देश का युवा अपने कैरियर को लेकर लक्ष्यबद्ध है। एक देश के नाते ये हमारे लिए सुकून का विषय होना चाहिए। अन्यथा तो हाल के दिनों में विश्व के कई देशों में राजनैतिक उथल -पुथल और अराजकता के पीछे इसी जेन-जी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। दरअसल,हमारी नई पीढ़ी ने खुद को जिम्मेदारी की चादर में समेटकर परिवर्तन की सकारात्मक राह को चुना है। आज देश में स्टार्टअप से लेकर अधुनातन अन्वेषणों की लम्बी श्रृंखला के सूत्रधार युवा ही है। स्वदेशी स्टार्टअप ने सात समंदर पार भी अपने कौशल का लोहा मनवा लिया है। आज का युवा जाति,सम्प्रदाय और धर्म के बंधनों को तोड़ चुका है, ये भारत के संस्कृति के मूल को सींचने जैसा है। जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होइ” के ध्येय वाक्य का बोध कराता हुआ आज का जेन-जी समृद्धि को ही हरि मानते हुए आगे बढ़ रहा है। बीच बीच में जरूर कोशिश की जाती है कि इस सद्भाव को तोड़ा जाए, धर्म/जाति/संप्रदाय के नाम पर ध्रुवीकरण करते हुए युवाओं के मन में नफरत के बीज का अंकुरण किया जाए,लेकिन अभी तक कमोबेश ये कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई हैं।भारत पहले भी जन के द्वारा स्थापित गण समूह का गणराज्य रहा है उसी को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का प्रयास हुआ है। लेकिन जिन आशा आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए गण तंत्र स्थापित हुआ था उसको निराशा में बदलने का प्रयास भी लगातार गन तंत्र के माध्यम से किए जाने की कोशिशें होती रही हैं। लेकिन, संतोष इस बात का है कि आदमी को आदमखोर बनाने वालों को अभी निराशा ही हाथ लगी है। आज भारत राजनीतिक उद्विकास के क्रम में जहां पहुंच रहा है वहां पुन: एक प्रकार का अधिनायकत्व उभरता दिख रहा है और उसे संपोषित करने के लिए ऐसे साधन उदित हो चुके हैं जो आम जन के नियंत्रण से परे हैं। आज गण के हितों के नाम पर बड़े-बड़े संघर्ष किए जा रहे हैं लेकिन सच यह है कि गण, तंत्र में कहीं खोता चला जा रहा है। कुल मिलाकर गणतंत्र में गण सबसे कमजोर हैसियत में है, जबकि सब-कुछ उसी के नाम पर हो रहा है। क्या कहीं पर ऐसी नैतिक रेखाएं खींची गयी हैं, जो इन प्रहसनों को रोक सकें? यदि नहीं, तो क्या इस देश का जन-गण स्वत:स्फूर्त होकर अपनी हैसियत को सिद्ध करने के लिए एकजुट होना ही चाहिए। और अंत में जिस गणतंत्र दिवस अर्थात अपने संविधान लागू होने को हम मानते है , उसकी लाज ‘तंत्र’ ने कितनी रखी है इसका मूल्यांकन भी आज के दिन अवश्य होना चाहिए।क्योंकि जिस जन और गण के तंत्र की हम बात करते हैं,उसमे बिखराव नहीं सद्भाव ही यथेष्ठ हैं।
सब जन गण बने, सब गण का मन बुने, तंत्र पर गण की जय सुने, गणतंत्र में गण को गिने नहीं गुने