प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
भारतीय जनता पार्टी के समृद्ध और दूरदर्शी’ वाच टॉवर’ ने पार्टी के कलेवर और तेवर बदलने के लिए पार्टी की ही लगभग उम्र के नितिन नवीन को अपना अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष तय कर लिया है। नितिन नबोन का जन्म भी 1980 में हुआ था और भारतीय जनता पार्टी का औपचारिक गठन भी 6 अप्रैल 1980 को ही हुआ था। लिहाजा यह पहली बार ही होगा कि 13 मुख्यमंत्री, 240 सांसद, 102 राज्य सभा सांसद और 1654 विधायकों और 17 करोड़ सक्रिय कार्यकर्ताओं की पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष उतने ही साल का नेता बना है, जितने वर्ष की पार्टी है। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के द्वारा नितिन नबीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना जाना पार्टी का नितांत व्यक्तिगत मामला है। इस देश में जहाँ सैकड़ों की संख्या में राजनैतिक दल पंजीकृत हैं वहां कितने अध्यक्षों के मनोनयन या निर्वाचन को महत्व दिया जाता है? कितने ही ऐसे दल हैं जहां वंशवाद की अमरबेल से राष्ट्रीय अध्यक्ष पुष्पित और पल्लवित हो जाता है? तब ऐसे मौके पर 46 साल के एक नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी बड़ी जिम्मेदारी देना, इस विषय पर चर्चा स्वाभाविक ही होनी चाहिए। जाहिर है, बतौर अध्यक्ष नितिन नबीन के सामने कोई बड़ी चुनौती सामने आएगी, मैं ऐसा मानने को तैयार नहीं हूँ। उसके पीछे बीजेपी को समृद्ध, सशक्त और अनुशासित मार्गदर्शक मंडल का होना है। जिसमे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से लेकर प्रधानमंत्री. गृहमंत्री. राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, जेपी नड्डा जैसे वर्षों से तपे तपाए नेताओं का दशकों का राजनैतिक अनुभव, नबीन की हर राह को नवीन स्वरुप में साकार करने को तत्पर दिखेगा। वैसे नबीन स्वयं अनुभवों की भट्टी में तपकर आज राजनैतिक उत्कर्ष पर हैं। मेरे लिए नितिन नबीन का अध्यक्ष का अध्यक्ष के रूप में ताजपोपी सत्ता हस्तांतरण का एक शानदार लोकतांत्रिक संवाद है। जिस देश में लोकतंत्र के नाम पर जिला स्तर पर हुई राजनैतिक नियुक्तियों के लिए दफ्तर के गेट और शीशे तोड़ दिए जाते हों वहां इतनी सहजता से एक राष्ट्रीत्र अध्यक्ष का मनोनयन सर्वसम्मति से हो जान, उस राजनैतिक दल के अंदर समृद्ध लोकतंत्र के पारिवारिक ताने-बाने की मिसाल है। विरोधी और आलोचक इसे पार्टी की तानाशाही कह रहे हैं और कहेंगे भी, लेकिन निश्चित रूप से यह मसला आपसी समझ का ही है। अन्यथा ती कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव का परिदृश्य याद ही होगा। खरगे बनाम थरूर की लड़ाई में जो जहर निकला उसी का परिणाम है कि आज भी शशि थरूर जैसा नेता अपने कांग्रेसी होने की गवाही खुद चीख चीखकर दे रहा है और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके नेता को पार्टी के अंदर हिकारत की नजर से देखा जा रहा है। जी 23 नाम का वरिष्ठ नेताओं के गुट ने अपने ही युवराज को पप्पू बनाने को कोई कमी नहीं छोड़ी। जिसकी भरपाई कांग्रेस आज भी नहीं कर पा रहा है। मैंने ऊपर लिखा यह सत्ता हस्तांतरण का एक शानदार लोकतांत्रिक संवाद है। वी इसलिए कि नबीन अब भाजपा के नए पोस्टर बॉय होंगे। अब संगठन में निर्विवाद रूप से वो सबसे सीनियर की भूमिका में होंगे, जहां उनके आस पास कई पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, राज्यों के उम्र दराज प्रदेश अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, सांसद तो होंगे ही युवाओं की एक महत्वाकांक्षी फौज भी होगी। आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में भी नवीन के नेतृत्व का लिटमस टेस्ट होगा, मैं ऐसा मानने को भी तैयार नहीं हूं। भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान स्वरुप को निखारने में करोड़ों कार्यकर्ताओं, लाखों स्वयंसेवकों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेतहाशा लोकप्रियता, आधुनिक राजनीति के चाणक्य अमित शाह का प्रबंधन और चुनाव लड़ने का बीजेपी का इकोसिस्टम कुछ ऐसा है करते हो तुन कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है, लिहाजा, चुनौती कोई नहीं है। हां, अपने इस निर्णय से बीजेपी नेतृत्व ने सभी को चौंकाया जरूर है, लेकिन इसमें भविष्य की संभावनाएं भरपूर हैं।




