हजारों जवाबों से बेहतर खामोशी…

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प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में सुषमा स्वराज जी को एक शेर के जरिए जो उत्तर दिया,उसने तब सुर्खियां बटोरी थीं। मनमोहन का वो तीर.. हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरु रखती है । आज स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री उदय प्रताप सिंह के लिए ढाल बन गया। लेकिन, इस बार खामोशी सवाल पूछने वालों की आबरू बचाने की नहीं,अपने सिस्टम में लगे थेगड़े को ढांकने के लिए थी। दरअसल, प्रदेश के सभी मंत्रियों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वो अपना दो साल का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखें। उसी जिम्मेदारी का पालन करते हुए मंत्री उदय प्रताप भी मीडिया से मुखातिब हुए। पहले स्कूल शिक्षा विभाग का लिखा हुआ फोल्डर पढ़ दिया,उसके बाद परिवहन विभाग की कार्ययोजना बताई। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले दो वर्षों के दौरान दोनों विभागों में उंगली में गिने जा सकने वाले काम तो हुए हैं। सांदीपनि विद्यालय को नए कलेवर और तेवर में लाने का जूनून मुख्यमंत्री का है। इधर दो दशक से बंद पड़ी लोक परिवहन को शुरू करने की जिद भी डॉ. मोहन यादव की पूरी होने वाली है। इस लिखे हुए को पढऩे की बारी के समाप्त होते प्रश्नों की बौछार होना स्वाभाविक था। हालांकि मीडिया के साथियों ने शुरुआत तो संयमित की,लेकिन फिर प्रश्न उछलने ही लगे। मेरे प्रिय कवि,गोपाल दास जी नीरज के शब्दों में – इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में , तुम को लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में। की तर्ज पर बदनाम परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर जब पूछा गया,ये भी पूछा गया विभाग कब दलालों के चंगुल से मुक्त होगा? मंत्री जी का जवाब बड़ा मासूम सा था ! जनता दलालों के पास जाती ही क्यों है? इस साफगोई उत्तर पर मंत्रीजी का वाकई अभिनन्दन होना ही चाहिए। जिस व्यवस्था में अर्दली लेकर अफसर तक दलालों से घिरे हों वहां की रियाया साहबानों तक सीधे कैसे पहुंच जायेगी ? कुछ दिन पहले ही वीडियो प्रसारित हुआ था जब न्यूज़ 24 रिपोर्टर को पीटने वाले दलाल ही दिखाई दे रहे थे। ये दलाल परिवहन विभाग के दफ्तरों के आसपास कैसे पहुंच जाते हैं ? यदि सब कुछ ऑनलाइन और एप्लीकेशन पर है तो जनता इसका उपयोग क्यों नहीं कर पाती? फिर जब अवैध चेक पोस्ट की बात उठी तो माननीय ने पहले तो इंकार किया लेकिन फिर इकरार कर स्वीकार किया कि विभिन्न शिकायतों के आधार पर 13 विभागीय लोगों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई है। लेकिन ,चेकपोस्ट के माध्यम से उगाही नहीं हो रही। चलित जांच दल बनाया गया है,जो वाहनों की जांच करता है। जाहिर है,’तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे ,जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे’। मतलब साफ़ था उदय प्रताप सिंह ने अपने मातहतों को बचाने और काजल की कोठरी को निष्कलंक दिखाने के लिए उन पूरे प्रमाणों को ही झुठला दिया जिनके माध्यम से लगातार अवैध वसूली के मामले सामने आते रहे हैं। विभाग के जांच का भी तरीका अजीब है। यदि कोई शिकायत आ रही है तो उसका परिक्षण पुलिस करेगी। अरे साहब,बच्चा-बच्चा जानता है की आरटीओ की उगाही का एक हिस्सा स्थानीय पुलिस को भी जाता है। तभी तो वसूली का कैंप लगाने की इजाजत मिलती है। एक तरफ तो सरकारी स्कूलों की शिक्षा को बेहतर बताया जा रहा है लेकिन अभिभावक आज भी अपने बच्चों को निजी शिक्षण संस्थानों में ज्ञान अर्जन करा रहे हैं, खुद नेताओं के बेटे भी प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। दूसरी तरफ परिवहन विभाग पर लगे अवैध वसूली के आरोपों पर वह मौन हैं। लेकिन तथ्य यह है कि मंत्री जी गृह जिले नरसिंहपुर के गोटेगांव अंतर्गत आने वाले ग्राम श्रीनगर में कुछ माह पहले बिना रजिस्ट्रेशन की यात्री बस ने कुछ बच्चों को दिन दहाड़े रौंद दिया था। कुल मिलाकर शिक्षा हो या परिवहन दायित्वों का कैसा हो रहा निर्वहन यह सवाल तो बनता है।अपेक्षा थी कि मंत्री उदय प्रताप सिंह कमियों को स्वीकार कर ,बेदाग़ व्यवस्था लागू करने का भरोसा देंगे। लेकिन,कमियों को नकार देने फिर उसमे सुधार की गुंजाइश ही नहीं बचती। सत्ता का मर्म ऐसा ही होता है,उसकी प्रवृति शुतुरमुर्ग सी होती है। जैसे किसी खतरे को भांपकर शुतुरमुर्ग अपना धड़ रेत में छिपाने की कोशिश तो करता है,लेकिन आसानी से शरीर दिखाता है वैसे ही आसन्न समस्या से निजात का नेता फार्मूला भी यही है कि समस्या को ही नकार दो। तभी तो मैंने शुरू में ही लिखा था उदय प्रताप सिंह ने बदनामी के थेगड़े से अटे पड़े सिस्टम का बचाव करने के लिए ख़ामोशी का सहारा लेकर आबरू ढंकने की कोशिश की।