अपने अपने राम…

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अभिव्यक्ति (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी… यह चौपाई कई मायनों में बड़ी ही क्रांतिकारी है। खासतौर वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक परिदृश्य में फिर वो चाहे राष्ट्रीय हो या प्रादेशिक ! जहां हर कोई अपने राम को अपनी सुविधा अनुसार गढ़ रहा है, मढ़ रहा है। दरअसल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का व्यक्तित्त्व और कृतित्व ही इतना विराट है कि बाल्यकाल से लेकर निर्वाण तक की यात्रा के कई पात्र जिए जा सकते हैं। और लगभग उन्हीं पात्रों को जीने की कोशिश कलयुग का नराधम कर रहा है। राम साधना नहीं साध्य हो चुके हैं. राम आराधना नहीं अनुराग हो चुके हैं, राम नीति नहीं नीयत हो चुके हैं। तो ऐसे में, हर कोई ‘राम काज किन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम’ की राह पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब देखिए न, बीजेपी के नए कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ‘निर्वाचित’ नितिन नबीन हों या मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली, उड़ीसा, हरियाणा के मनोनीत मुख्यमंत्रीगण हों। इनके ‘अपने राम’ तो निस्संदेह राजा राम ही होंगे, क्योंकि- जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएं दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥ सुंदरकांड दोहा 48 (ख) में गोस्वामी जी लिखते हैं… रावण ने तपस्या करके और अपने दस सिरों की बलि देकर भगवान शिव को प्रसन्न किया था, जिसके फलस्वरूप शिवजी ने उसे अपार धन-संपत्ति और वरदान दिए थे।जब विभीषण रामजी की शरण में आए, तो रामजी ने उन्हें वही संपत्ति दी, जो शिवजी ने रावण को दी थी, लेकिन रामजी को संकोच हुआ, यह सोचते हुए कि मेरे शरणागत भक्त को मैंने कहीं कुछ तुच्छ वस्तु न दे दी हो. क्योंकि विभीषण की भक्ति, नीति और निर्मलता रावण से कहीं श्रेष्ठ थी। लिहाजा इन सभी को वो मिला जो इनसे ज्यादा अनुभवी लोगों को अप्राप्त था। मतलब, इनके ‘अपने राम’ तो काम के निकले।फिर इस दिनों संसद में जी राम जी भी चल रहे हैं। मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाकर उसमें राम जी का नाम जोड़कर और अधिक प्रभावी बनाने पर विपक्ष एतराज हो गया। हालांकि श्री राम के नाम पर हमारे देश के विपक्षी पार्टी को इतना एतराज क्यों होता है? यह बात आज भी समझ से परे हैं। भगवान श्री राम की गाथा को गाकर कई पंडे आज पंडित हो गए और माया और काया में दिनदूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है। राम नाम का व्यवसाय सफल हो रहा है। उनके भी अपने राम हैं, जो भौतिक सुख सुविधा के निमित्त बन रहे हैं। फिर वनवासियों के भी राम हैं जो उनके द्वार पर उसी रूप में आते हैं जिस रूप में माता शबरी से मिलने आए थे। जाहिर है, शबरी से मिलने वाले राम स्वयं राज वैभव छोड़कर खाली हाथ आए थे, इसलिए बैर खाकर चले गए कुछ दिया नहीं। सिंगरौली के जंगलों में भी वनवासियों को कुछ मिल नहीं रहा है, बल्कि जो है वो भी छीना जा रहा है क्योंकि वनवासियों को राम कुछ देने की स्थिति में नहीं हैं। एक भजन था मेरे तन में राम, मन में राम रोम-रोम में राम… अब राम व्यापक हो गए हैं, और विराट हो गए हैं। शायद त्रेता युग में भगवान राम की महिमा को तब के लोग नहीं समझ पाए होंगे जितना कलयुग के महापुरुष उनको अपने राम के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। एक प्रशिक्षु पत्रकार की हैसियत से मैं भी अब बड़ी ऊहापोह में पड़ गया हूं। मेरे अपने राम का स्वरूप क्या होना चाहिए? भए प्रकट कृपाला वाले या बाल्मीकि ऋषि वाले जिसमे ‘जान आदिकबि नाम-प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ।।’ मरा मरा कहकर उन्होंने अपने राम को पाया।या फिर अहिल्या को नवजीवन देने वाले राम या जटायु से परम मित्रता रखने वाले राम, या सुग्रीव से दोस्ती कर बाली के अनाचार से बचाने वाले, हनुमान जी को अपने शरण में लेकर परम प्रतापी बनाने वाले या रावण का दंभ नाश करने के बाद भी लक्ष्मण जी से रावणनीति सीखने का निर्देश देने वाले मेरे राम। खैर, मेरे अपने राम तो लोकायतन के सर्व मंगल में ही लगे हैं।