संदर्भ विश्लेषण: सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
श्रीराम चरित मानस की एक चौपाई में गोसाईं तुलसीदास जी लिखते हैं, “जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया, तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया” वर्तमान में मध्यप्रदेश में चल रहे शासन और शासक को इस चौपाई के नजरिए से समझने की आवश्यकता है। दरअसल, प्रदेश चतुर्दिक विकास के नए सोपान गढ़ रहा है। समग्र विकास की गूंज सुनाई पड़ भी रही है और दिख भी रही है। राजकाज के सभी पक्षों को समेटे मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव और उनका मंत्रिमंडल सर्वस्पर्शी निर्णयों और कार्यों से प्रदेश की जनता को यह एहसास कराने में सफल दिखाई दे रहा है कि बहुजन सुखाए, बहुजन हिताय का मूलमंत्र शासन का केंद्र बिंदु है। 13 दिसंबर 2023 को बतौर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान संभाले डॉ. मोहन यादव ने कई अवसरों पर अंग्रेजी के शब्द lead from upfront को चरितार्थ किया है। वे स्वयं प्रतिमान गढ़ते जो नजीर बने हैं। हाल ही में अपने चिरंजीव का विवाह सामूहिक विवाह समारोह में कराकर उन्होंने मितव्ययता और फिजूलखर्ची को रोकने का नैतिकबल दिखाकर नई बहस को जन्म दिया है। अकेले सामूहिक विवाह ही नहीं ,बात तो यह भी खूब चली कि मोहन जी सीएम हाउस में अपने परिजनों को नहीं रखते। डॉ. यादव को परिवार साथ में रखने की कोई पाबंदी नहीं है लेकिन जैसा शुरू में ही मैने लिखा ‘जिन के कपट दंभ नहीं माया’ लिहाजा मुख्यमंत्री का यह त्याग भी रेखांकित किया ही जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘GYAN’ को आगे बढ़ाते हुए युवा, किसान, महिला, गरीब के जीवन में खुशहाली की चमक बिखेरने का प्रयास सरकार नित कर रही है। इस अल्प समय में प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को, संस्कृति और संस्कारों को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर स्थापित किए जाने के भी भागीरथ प्रयास हुए। जिस मंत्रिमंडल में कैलाश विजयवर्गीय, राजेंद्र शुक्ला, जगदीश देवड़ा, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह, विजय शाह,करणसिंह वर्मा जैसे अनुभवी नरेंद्र शिवाजी पटेल, प्रतिमा बागरी,दिलीप अहिरवार, राधा सिंह जैसे पहली बार के विधायक मंत्री बने हों जाहिर है संतुलन साधने की बाजीगरी आनी चाहिए भी और आवश्यकता भी है। डॉ.यादव ने वरिष्ठों को सम्मान और कनिष्ठों की दुलार की अद्भुत समन्वय से अपने नेतृत्व का लोहा मनवा लिया है। मोहन सरकार की असली अग्नि परीक्षा सिंहस्थ में होगी,ऐसा राजनीति के छात्र मानते हैं। प्रत्येक 12 साल में होने वाले सिंहस्थ में पहली बार ऐसा संयोग जुड़ेगा जब उज्जयिनी के वैभव का उद्घोष करने के लिए महाकाल की नगरी का ही नेतृत्व होगा। दरअसल,प्रयागराज महाकुंभ को अभी तक के ज्ञात इतिहास में सबसे सफल सांस्कृतिक अनुष्ठान माना गया है। लिहाजा डॉ. यादव और उनकी टीम के सामने यह चुनौती अपने आप ही खड़ी हो गई है कि सिंहस्थ की व्यापकता अपने वैराट्य स्वरूप में दिखाई दे। मोहन यादव ने अभी तक किसी भी काम को असंभव के रूप में नहीं छोड़ा है। चाहे आरबीसी एक्ट में बदलाव हो,निवेश के लिए रेड कार्पेट बिछाने में मिली सफलता हो, लाडली बहना की राशि बढ़ानी हो, किसानों की पहली बार सोयाबीन का समर्थन मूल्य दिलवाना हो,अधोसंरचना विकास में नवाचार करना हो या फिर रोजगार के अवसर सृजन कराना हो। सरकार ने अपनी प्राथमिकता और प्रतिबद्धता हमेशा दिखाई है। जो कभी नहीं हुआ वो करने की ललक भी इस सरकार ने दिखाई। जैसे, यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा निपटान, दशकों से बंद राज्य परिवहन की शुरू करना, नदी जोडऩे का साहसिक निर्णय आदि इत्यादि काम को पूरा करके विकास की इबारत की लंबी लकीर खींचते मोहन सम्मोहित करते लगते हैं।सामान्य पृष्ठभूमि से निकले और एक प्रदेश के मुख्यमंत्री तक पहुंचने के सफर में मोहन यादव ने अपने आस पास दंभ या कपट को आसपास फटकने भी नहीं दिया।एक पुत्र के लिए सबसे महा शोक पिता का बिछडऩा होता है, लेकिन पिता की मुखाग्नि के तुरंत बाद अपने प्रदेश की जनसेवा में लग जाने की सीख जैसे अपने पिता की सच्ची श्रद्धांजलि ही थी। राजनैतिक रूप से भले ही विपक्ष सरकार के कामों की आलोचना करता हो,लेकिन एक मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव ने विपक्ष को भी साथ लेकर चलने का सामथ्र्य दिखाया है। आगामी 13 दिसंबर को जब मोहन यादव के कार्यकाल के दो वर्ष पूर्ण होंगे तो सरकार की थैली उपलब्धियों से तो भरी दिखेगी ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा आने वाले वर्षों में अपेक्षाओं का बड़ा बोझ भी होगा। सदा अम्बालवी की दो लाइन में यदि अपनी बात को विराम दूं तो… “तुम सितारों के भरोसे पे न बैठे रहना, अपनी तदबीर से तक़दीर बनाते जाओ”
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