बिहार में एनडीए की ‘प्रधान’ जीत , धर्मेंद्र को मिलेगा ‘रिटर्न गिफ्ट’

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खबर विश्लेषण: (मध्य स्वर्णिम) ऋषिकांत सिंह (रजत) परिहार (मो. 09425002527)
बिहार का कुरुक्षेत्र एनडीए के पांच पांडवों ने जीत लिया, जीत भी कोई ऐसी वैसी नहीं। बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में विपक्ष का गर्दा उड़ा दिया। ये जीत कई मायनों में राजनीति की बड़ी लक्ष्मण रेखा खींचने में कामयाब रही है। एंटी इनकंवेंसी को कैसे प्रो गवर्मेंट बनाना है वो कोई बीजेपी से सीखे। हालांकि इस जीत के प्रमुख नायक आधुनिक राजनीति के चाणक्य अमित शाह ही थे, जिन्होंने बिहार में कैंप कर हर माहौल को सकारात्मक बनाया। अब बिहार में सरकार ने शपथ ग्रहण कर ली है तो एक बार फिर विश्व के सबसे बड़े राजनैतिक दल के अध्यक्ष को लेकर चर्चाएं फिर तेज हो गई है। बीजेपी के बड़े संकट मोचकों में शुमार, पार्टी के नवरत्नों में से एक ‘धर्मेंद्र प्रधान’ के हाथ बीजेपी की कमान होगी, संकेत तो इशारा इसी तरफ कर रहे हैं। दरअसल, धर्मेंद्र प्रधान लंबे वक्त से संगठन द्वारा दी गई हर एक अग्निपरीक्षा को सफलता पूर्वक सम्पन्न करते आ रहे हैं। वो हमेशा खामोश रहते हैं, लेकिन उनका काम बढ़-चढकर बोलता है। मोदी और शाह के सबसे भरोसेमंद प्रधान, संघ प्रमुख डॉक्टर मोहन भागवत के भी चहेते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी की केंद्रीय सरकार में शिक्षा मंत्री कौन होगा, वे संघ ही तय करता है। वैसे बिहार को प्रचंड जीत के शिल्पकार धर्मेंद्र प्रधान ही रहे हैं ऐसा माना जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। ओडिशा से आने वाले प्रधान का बिहार से पुराना रिश्ता रहा है। 2010 में उनके प्रभारी रहते भाजपा जदयू ने रिकॉर्ड 206 सीटें जीतीं थीं, इसका उन्हें ईनाम भी मिला। पार्टी ने 2012 में बिहार से ही राज्यसभा भेजा। यही से उनकी जड़ें इस राज्य की राजनीति और संगठन में मजबूत होती चली गई। ओबीसी की उसी कुर्मी जाति से धर्मेंद्र प्रधान आते हैं, जिससे नीतीश कुमार हैं। दोनों की आपस में भी अच्छी बात चीत हैं। इस बार भाजपा ने इसी पुराने तालमेल को देखते हुए प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा था। यही वजह रही कि जदयू से बहुत जल्द बिना किसी खटपट के सीटों का बंटवारा हुआ और टिकट भी समय से पहले जारी हो गई थी। भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके धर्मेंद्र प्रधान का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड शानदार है। 2024 में बतौर प्रभारी हरियाणा या फिर 2022 में यूपी और 2017 की उत्तराखंड की जीत या फिर गृह राज्य ओडिशा की जीत के भी शिल्पकार रहे है। 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में उस नंदीग्राम सीट पर प्रधान ही भाजपा के प्रभारी थे, जहां से मुख्यमंत्री रहते ममता बनर्जी चुनाव हार गई थी। वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री होने के बाद भी प्रधान, लो प्रोफाइल रहते हैं। खामोशी के साथ कार्य करते हैं, लेकिन नतीजे शोर मचाते हैं। उनकी प्राथमिकता हमेशा स्थानीय नेताओं से सीधे संवाद, बूथ स्तर की संरचना को मजबूत करना और हर सीट के माइक्रो- मैनेजमेंट की रहती है। यकीनन साल भर के अंदर हरियाणा और बिहार की जीत पार्टी की झोली में डालकर उन्होंने बड़ी लकीर खींची है। नतीजों से प्रधान का कद पार्टी में बढ़ा है और यदि रिटर्न गिफ्ट के रूप में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रूप में धर्मेंद्र प्रधान की ताजपोशी हो जाए तो आश्चर्य मत कीजिएगा। क्योंकि अनुभव की भट्टी में लंबे समय से तपकर ‘धर्मेंद्र’ ऐसे नेता बन चुके हैं जो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के ‘प्रधान’ बनने को तैयार हैं।