भोपाल: प्रदेश में 15 नवंबर से बाघों के आकलन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी यह मुहिम तेज हो गई है। जंगल में जगह-जगह कैमरा ट्रैप लगा दिए गए हैं, जिनकी मदद से बाघों की असल संख्या का पता लगाया जाएगा। यह काम जितना दिलचस्प लगता है, उतना ही एहतियात और मेहनत मांगता है। कैमरा ट्रैप जंगल की तीसरी आंख की तरह काम करते हैं, जो खामोशी से हर हलचल को रिकॉर्ड करते हैं। बांधवगढ़ के खेतौली वन परिक्षेत्र अधिकारी के अनुसार कैमरा ट्रैप में मोशन सेंसर कैमरे लगाए जाते हैं। जैसे ही कोई जानवर उसके सामने से गुजरता है, कैमरा अपने आप तस्वीर ले लेता है। इसे कैमरा ट्रैपिंग कहा जाता है। पूरा वन क्षेत्र दो किलोमीटर के ग्रिड में बांटा जाता है और हर ग्रिड में कैमरों की एक जोड़ी लगती है। दोनों कैमरे आमने-सामने होते हैं ताकि बाघ के दाएं और बाएं हिस्से की धारियां साफ दिखाई दें। यही धारियां उसकी पहचान का सबूत मानी जाती हैं, जैसे इंसान के फिंगरप्रिंट। जब कैमरा ट्रैप 24 घंटे तस्वीरें लेना शुरू कर देता है तो ये तस्वीरें जबलपुर स्थित स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट और देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भेजी जाती हैं। यहां एक खास सॉफ्टवेयर बाघों की धारियों को स्कैन करता है। हर बाघ की धारियां अलग होती हैं, बिल्कुल यूनिक ।
तकनीक और कौशल का शानदार मेल:
कैमरा ट्रैप लगाना कोई आसान काम नहीं है। कैमरा लगभग 45 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर लगाया जाता है, यानी एक वयस्क आदमी के घुटने के बराबर। इस ऊंचाई से बाघ का मिडिल हिस्सा और दोनों ओर की धारियां साफ दिखती हैं, जिन्हें क्रमश: राइट फ्लैंक और लेफ्ट फ्लैंक कहा जाता है। जंगली रास्ता चुनते समय पूरी सावधानी रखनी होती है ताकि कैमरा गलत दिशा में न लग जाए और तस्वीरें बेकार न जाएं। वनकर्मियों के मुताबिक यह काम बेहद नाजुक है और गलत सेटिंग पूरी मेहनत को बेअसर कर सकती है।अखिल भारतीय बाघ आकलन हर चार साल में किया जाता है। 2006 से शुरू हुई यह प्रक्रिया अब 2026 में अपने छठे संस्करण में है। बाघ आकलन 2022 में बांधवगढ़ लैंडस्केप में 165 बाघ दर्ज हुए थे, जो पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा हैं।




