प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): राकेश व्यास (मो. 9977701999)
जंतर-मंतर केवल दिल्ली का एक स्थान नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जहां जनता अपनी बात सत्ता तक पहुंचाने के लिए एकत्र होती थी ,होती है और हमेशा होती रहेगी । जब संसद और सरकार के दरवाजों तक आम नागरिक की आवाज आसानी से नहीं पहुंच पाती, या ये कहे उन्हें जागना हो तब जंतर-मंतर लोकतांत्रिक संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बन जाता है। यहां उठने वाली आवाजें केवल विरोध की आवाजें नहीं होतीं, बल्कि वे उस असंतोष, पीड़ा और अपेक्षा का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसे समाज का कोई वर्ग ( बच्चे,बूढ़े,किसान ,)महसूस कर रहा होता है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यह है कि सत्ता जनता की बात कितनी गंभीरता से सुनती है। चुनाव के समय जनता से संवाद करने वाली सरकारों के लिए यह भी आवश्यक है कि सत्ता में आने के बाद वे जनता की शिकायतों, आंदोलनों और विरोध को भी उतनी ही गंभीरता से सुनें। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक हो जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में सरकार का काम केवल सुविधाजनक आवाजें सुनना नहीं, बल्कि असहमति और विरोध की आवाजों को भी सुनना है। हर आंदोलन सही हो, यह आवश्यक नहीं; हर मांग मान लेना भी संभव नहीं। लेकिन हर मांग को सुने बिना खारिज कर देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। सरकार और जनता के बीच संवाद का तंत्र जितना मजबूत होगा, उतना ही लोकतंत्र सही रहेगा। यदि जनता को अपनी बात कहने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़े और सरकार उन आवाजों को अनदेखा करती रहे, तो धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होता है। इसके विपरीत, यदि सरकार विरोध करने वालों से संवाद करे, उनकी समस्याओं को समझे और उचित मांगों पर समाधान का रास्ता निकाले, तो टकराव की स्थिति को सहयोग में बदला जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जंतर-मंतर को केवल विरोध प्रदर्शन का स्थान न समझा जाए। इसे सरकार और जनता के बीच संवाद के एक लोकतांत्रिक सेतु के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार को यह समझना होगा कि जनता की आवाज हमेशा चुनावी नारों में नहीं होती,कभी वह किसी प्रदर्शनकारी के हाथ में उठी तख्ती में होती है, कभी किसी कर्मचारी की मांग में, कभी किसी किसान की चिंता में और कभी किसी आम नागरिक की शिकायत में। सत्ता के पास निर्णय लेने की शक्ति होती है, लेकिन जनता के पास उन निर्णयों को प्रभावित करने का लोकतांत्रिक अधिकार। इन दोनों के बीच संवाद ही लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है। इसलिए सरकारों को आलोचना से डरने के बजाय उसे सुनने की आदत विकसित करनी चाहिए। जंतर-मंतर की आवाज को दबाने या नजरअंदाज करने के बजाय उसे सुनना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है—वह सत्ता की वास्तविक मालिक है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन जनता और उसकी आवाज लोकतंत्र की स्थायी शक्ति है। इसलिए सरकार को जनता की सुननी चाहिए, उससे संवाद करना चाहिए और जहां संभव हो, उसकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। यही लोकतंत्र की सच्ची मर्यादा है। और अगर ऐसा नहीं होता तो जनता सड़को पर आक्रोशित हो जाती है और इसका परिणाम चाहे आंदोलनकारी हो चाहे सरकार या आम नागरिक सब को भुगतना पड़ता है ।
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