नरोत्तम लड़ते तो संगठन नहीं लड़ता…

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अपनी बात: सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
अपनी अलौकिक, दिव्य ज्योतिपुंज से करोड़ों सनातनी परिवार की आस्था के केंद्र मां पीताम्बरा के दतिया में हो रहा चुनाव अब साख का सवाल बन गया गया है।वैसे तो राजनैतिक दलों के लिए कोई भी चुनाव साख का ही होता है, लेकिन दतिया विधानसभा उपचुनाव के परिणाम कई विश्लेषणों में रेफरेंस के काम आएंगे, ऐसा मेरा मानना है। बहुधा देखा जाता है कि उपचुनाव को लेकर दिलचस्पी नहीं होती और इसमें सत्ताधारी दल को ही जीत मिलती रही है। विजयपुर इत्यादि को इसका अपवाद माना जा सकता है। फिर दतिया को लेकर इतना उबाल क्यों? दरअसल, दतिया विधानसभा उपचुनाव के पहले ही डॉ नरोत्तम मिश्र स्वघोषित उम्मीदवार बनकर सभाएं, संपर्क करने लगे थे। एक प्रकार से उन्होंने उम्मीदवारी को लेकर पार्टी आलाकमान के सामने विकल्प के रास्ते लगभग बंद कर दिए थे। उनके समर्थक भी मान चुके थे कि ‘आएंगे तो दादा ही’ टिकट घोषित हुई उसके बाद की परिस्थिति सभी को मालूम है । अब बात आगे की मैने क्यों लिखा, नरोत्तम लड़ते तो संगठन नहीं लड़ता ? स्पष्ट है दतिया में पार्टी की कथित बगावत के दूसरे दिन से ही बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव की कमान अपने हाथों में ले ली है। उम्मीदवार के रूप में आशुतोष तिवारी नहीं बल्कि शिवप्रकाश, जामवाल,हेमंत खंडेलवाल,डॉ महेंद्र सिंह के साथ पूरा संगठन की चुनाव में जुट गया है। अब तो इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने मंत्रिमंडल के बड़े चेहरों को भी चुनावी समर में झोंक दिया है। विधानसभा सत्र चल रहा है और आधा मंत्रिमंडल दतिया के गांवों में कैंप कर रहा है। उपचुनाव को लेकर बीजेपी की संजीदगी इसी बात से स्पष्ट हो जाती है। अब इसको उलट कर दीजिए, यदि नरोत्तम मिश्र चुनाव लड़ते तो ? ‘दतिया के दादा’ की पार्टी के इतर एक समानांतर व्यवस्था थी ।चुनाव के सभी प्रबंधन इन्हीं व्यक्तियों के हाथ होते थे, बूथ मैनेजमेंट से लेकर चुनाव संचालन तक की जिम्मेदारी इन्हीं पैरलल व्यवस्था के लोग संभालते थे।लेकिन,अब बीजेपी को बूथ लेबल एजेंट तक नए नियुक्त करने पड़ रहे हैं।आशय स्पष्ट है कि संगठन भले चुनाव संचालन की जिम्मेदारी नरोत्तम मिश्रा को दे चुकी है, लेकिन व्यवस्था को लेकर बहुत अलर्ट है। एक रणनीति के तहत संगठन साइड लाइन किसी को नहीं कर रहा है किंतु पूर्ण रूप से कमान भी किसी को सौंपने में उतावला नहीं है बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व के आधार पर दतिया के दरिया से आशुतोष को किनारे लगाने की कवायद पूरी है। बीजेपी नेतृत्व को पता है कि इस उपचुनाव में कांग्रेस के अलावा पार्टी को चुनौती अपनों से भी है जो मतदान के दिन तक मिलने वाली है। इस उपचुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो विश्लेषण बड़ा ही रोचक होगा। पार्टी विथ डिफरेंट की लाइन पर चली बीजेपी ने कैसे दतिया में डिफरेंस पैदा कर दिया यह पॉलिटिकल शोधार्थियों के लिए केस स्टडी की तरह काम करने वाला है। अभी तो दतिया में मुद्दा विकास नहीं, टिकट का बंटवारा नहीं संगठन की सामूहिक तैयारी और नरोत्तम दादा ही हैं। कुछ दिनों में मुख्यमंत्री भी इस प्रचार को गर्माहट देने मैदान में उतरेंगे, तब और देखना दिलचस्प होगा कि-
वो पूछता था मेरी आँख भीगने का सबब, मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया