नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि केवल गाली-गलौज, अपमानजनक या अश्लील शब्दों का इस्तेमाल, चाहे वे कितने भी आपत्तिजनक या असभ्य क्यों न हों, को अपने आप में अश्लीलता नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें निचली अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294 के तहत सुनाई गई सजा को बरकरार रखा गया था। पीठ ने कहा कि केवल अपमानजनक या अश्लील भाषा का इस्तेमाल कर देना, अपने आप में आईपीसी की धारा 294 के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं बनता। दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी कथन को अश्लील मानने के लिए यह साबित होना चाहिए कि वह कामुक प्रकृति का हो, कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो और उसे सुनने या देखने वालों के मन को दूषित और भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो। अदालत ने कहा, अगर शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों को पहली नजर में पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, तब भी उन्हें अश्लील नहीं कहा जा सकता। पीठ ने कहा कि ऐसे शब्द, चाहे कितने भी अपमानजनक, अप्रिय या असभ्य हों, आईपीसी की धारा 294 (बी) की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करते।




