अंजाम पे रोना आया…

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विशेष संपादकीय (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
यूं हर शाम उम्मीदों में गुजऱ जाती थी आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
शकील ये लाइन आज बरबस ही दिमाग में कौंधने लगी…सिस्टम से लगी हुई उम्मीद खाक होती सी दिख रही है। ट्विशा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत और अकारण को कारण बताने में जी – जान से लगा तंत्र जिसकी वजह से बारह दिन बीत जाने के बाद भी शव को अग्नि नसीब नहीं हुई कोई सामान्य घटना नहीं कही जानी चाहिए। न्याय का सिद्धांत भी इस प्रकरण में भटकता ही दिखा है। दरअसल,ट्विशा की कथित आत्म हत्या और उसके बाद परिजनों का असंतोष और भोपाल पुलिस की जिद ने इस मामले में संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दीं। बिसरा रिपोर्ट आने के पहले ही इसे आत्महत्या करार देने की जल्दबाजी ने पुलिस के बचाव की खोखली पटकथा का ही हिस्सा रहा है। परिजनों और जीवित समाज की कोशिशों से मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने मामले को सीबीआई को सौंप दिया। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले को आज सुनवाई के लिए लिस्टेड किया है। मामला ससुराल में युवती की अस्वाभाविक मौत के मामले में संस्थागत पक्षपात और प्रक्रिया संबंधी गड़बडिय़ों के आरोप पर स्वत: संज्ञान के तहत सुना जाएगा। जाहिर है ,सर्वोच्च न्यायालय को भी लगता है कि इस प्रकरण में भोपाल पुलिस ने प्रोफेशनल रवैया नहीं अपनाया! यही शिकायत तो ट्विशा के परिजन पहले दिन से ही लगाते आ रहे हैं। मामले में दूसरे पक्ष का रसूख और उसके आगे नतमस्तक दिख रही कटारा हिल्स पुलिस ने बचने के पूरे अवसर दिए, यह आरोप लगना तो स्वाभाविक ही है। भले ही ट्विशा ने आत्महत्या ही क्यों न की हो? लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य एकत्रित करने का काम तो पुलिस का ही था। डिजिटल साक्ष्य मिटते रहे,आरोपी प्रेस कांफ्रेंस कर मृतिका की चरित्र हत्या करते रहे,अग्रिम जमानत भी मिल गई और जबलपुर जिला अदालत में समर्थ सिंह बेखौफ पहुंच जाता है। पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह करने के लिए क्या इतना पर्याप्त नहीं है? बालाघाट को नक्सल मुक्त कर भोपाल पुलिस कमिश्नर बने संजय सिंह की क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। लेकिन, ट्विशा शर्मा के मामले में जिस प्रकार पुलिस ने जिद की लकीर खींची उसने राष्ट्रीय स्तर पर शर्मसार किया है। केस सीबीआई को सौंपे जाने की मुख्यमंत्री की मजबूरी भी भोपाल पुलिस को झकझोर नहीं पाई।अब तो देश की शीर्ष अदालत भी इसे संस्थागत पक्षपात मानकर सुनवाई कर रही है।सीबीआई भी जांच करेगी और तय है हर बिंदु पर जांच होगी तब नैसर्गिक न्याय मिलने की उम्मीद मृत शरीर हो होगी। ट्विशा की मौत के मामले में दोषी कौन है? परिस्थिति या पारिस्थितिकी ये तो गहन जांच का विषय है। लेकिन, भोपाल पुलिस का इकबाल इस मामले में मरता ही दिखाई दिया, यदि ये लिखूं तो अतिश्योक्तिनहीं होनी चाहिए।प्रदेश के मुखिया की संवेदनशीलता को किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है।ये भी तय है कि आज शीर्ष अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान आए पहलुओं के आलोक में जांच अधिकारियों पर गाज भी गिरेगी । जैसा मैने शुरुआत की थी आज कुछ बात है जो शाम पर रोना आया अदालती निर्णय कुछ भी, उच्च न्यायालय भले गिरीबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द कर दे, शीर्ष कोर्ट किसी कठोर निर्णय पर पहुंच जाए हर हाल में व्यवस्था पर रुदन तो आम नागरिक को ही करना पड़ेगा।यदि भोपाल पुलिस शुरू में ही बिना दबाव, बिना भेदभाव अपना काम प्रोफेशनल तरीके से करती,जिसकी बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है तो इतनी भद नहीं पिटती। इस मामले में मुझे लिखने में कोई गुरेज नहीं है कि ,दरअसल आत्महत्या (जो थ्योरी पहले दिन से भोपाल पुलिस बता रही है ) ट्विशा नहीं बल्कि भोपाल पुलिस के तंत्र ने की है। ट्विशा ने तो बेल्ट को माध्यम बनाकर जांबाज और काबिल अफसरान की साख बचाने का काम किया है । मध्य स्वर्णिम लिखा था—’तड़पती देह पर सुलगते सवाल’। यह तय है कि इन सुलगते हुए सवालों की वजह से ही ट्विशा शर्मा की देह मौत के बारह दिन बाद चिता तक पहुँच पाई। न्याय की इस कछुआ चाल और तंत्र की संवेदनहीनता पर हम सभी को आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है।