नई दिल्ली (मध्य स्वर्णिम): मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे। अदालत ने कहा कि यदि चयन समिति में केवल सरकार का प्रभाव रहेगा, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जब सीबीआई निदेशक की नियुक्ति समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाता है, तो चुनाव आयोग जैसे लोकतंत्र के अहम संस्थान की नियुक्ति प्रक्रिया में कोई स्वतंत्र सदस्य क्यों नहीं है ? जस्टिस दत्ता ने कहा कि सीबीआई निदेशक के चयन में सीजेआई शामिल होते हैं । इसे कानून व्यवस्था और ‘रूल ऑफ लॉ’ बनाए रखने से जोड़ा जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र को बनाए रखने और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र सदस्य क्यों नहीं होना चाहिए ? अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा व्यवस्था में चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच मतभेद हो, तो तीसरा सदस्य सरकार के पक्ष में ही जाएगा।
कानून की व्याख्या का अधिकार:
पीठ ने यह भी कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन कानून की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है।जस्टिस दत्ता ने कहा कि पहली नजर में हमें यह परेशान करता है कि कार्यपालिका के पास वीटो जैसी स्थिति क्यों है? संसद कानून बना सकती है, लेकिन उसकी संवैधानिक वैधता की जांच और व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ही करेगा।




