गंगोत्री से गंगासागर, नमो ने भर दी गागर

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प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो.9713289999)
“प्यासे रहो न दश्त में बारिश के, मुंतज़िर मारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े”
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं। कमोबेश अलग- अलग राज्यों में मिश्रित जनादेश था। असम में सत्तारूढ़ बीजेपी ने जीत की हैट्रिक लगाईं,पुडुचेरी में परिणाम एनडीए गठबंधन के साथ था, केरलम यूडीएफ के लिए खुश होने का पैगाम लेकर आया तो तमिलनाडु में विजय ने अपनी पताका फहराई । जमीन पर पांव मारकर पानी निकालने की जूनून का सबसे बड़ा बानगी बना पश्चिम बंगाल। दशकों से कोशिशों में लगी बीजेपी के लिए सबसे बड़ा और प्रचंड जनादेश कहीं का था तो वो पश्चिम बंगाल से आया है। याद कीजिये 2014 लोकसभा,वाराणसी का वो चुनाव जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा था- मुझे तो यहां मां गंगा ने बुलाया है । दरअसल, पश्चिम बंगाल की जीत सही मायने में बीजेपी की गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक राजनैतिक फलक पर अश्वमेघ यज्ञ की पूर्णाहुति जैसी ही है। नदियों में सर्वाधिक पवित्र और करोड़ों सनातनियों की आस्था प्रतीक मां गंगा से उद्गम गंगोत्री (उत्तराखंड) से लेकर ऋषिकेश / हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), पटना (बिहार), फरक्का ( पश्चिम बंगाल), गंगासागर जहां गंगा जी बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, अब इन सभी राज्यों में भाजपाशासित मुख्यमंत्री होंगे। ये कोई सामान्य राजनैतिक समीकरण नहीं है, ये उस सोच को साकार करने जैसा ही है जो जनसंघ की स्थापना के समय जन्म लिया होगा । जिस जनसंघ की स्थापना पंडित श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की, उस बंगाल में इतने दशकों बाद पार्टी का सत्ता में आना अनेक बलिदानों का ही प्रमाण है। दरअसल, राजनीती में हार और जीत होती रहती है यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है और उत्सव भी है। लेकिन ,चुनाव कैसे लड़ा जाना चाहिए यह अब भारतीय जनता पार्टी से देश के राजनैतिक दलों को सीखना चाहिए, विचार का प्रवाह कैसे फैलाना चाहिए यह मन्त्र भी बीजेपी से लेना चाहिए। पॉलिटिकल पंडित एक शब्द बड़ी आसानी से कह देते हैं कि परिणाम एंटीइंकम्बैंसी का नतीजा है । व्यक्तिगत रूप से मैं इस पर अपनी सहमति नहीं देना चाहूंगा। बीजेपी की सरकारें जिन राज्यों में होती हैं वहाँ यही जनादेश प्रो – इंकम्बैंसी की तरह काम करता है । असम के अलावा भी कई राज्य जिसमे मध्यप्रदेश भी शामिल है, इसका उदाहरण हो सकता है। जाहिर है, चुनाव कोई त्यौहार नहीं है जिसे सेलिब्रेट करने के लिए पॉलिटिकल प्रवास एक महीने या कोई त्यौहार नहीं है जिसे सेलिब्रेट करने के लिए पॉलिटिकल प्रवास एक महीने या पंद्रह दिन की तैयारी के साथ की जाए । अब चुनाव जीतना है तो हर दिन पूरे साल बिना रुके जनता से जुड़ाव की विकल्प है। यही बात अमित शाह ने कहा था, बीजेपी नहीं जीतती, विपक्ष हारता है क्योंकि बीजेपी 24म7 काम करती है। पश्चिम बंगाल में सत्ता ने करवट ऐसे ही नहीं ले ली। बीजेपी लगातार 2014 के बाद बंगाल के अभेद्य गढ़ को ढहाने की रणनीति पर काम करती रही है । यह भी सही है कि राजनैतिक हिंसा में सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ताओं की मौतें भी हुई और नुकसान भी हुआ, लेकिन जिस जीवटता के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा नेतृत्व बंगाल में खुद को खपाता दिखा यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के जनादेश पर यदि शोध भी किया जाना चाहिए। देश के राजनैतिक फलक पर भारतीय जनता पार्टी के विस्तार को करीब से देखने वालों को पता होगा कि एक पार्टी के तौर पर बीजेपी काफी संगठित है और नेतृत्व के फैसले पर कोई लेकिन, किंतु, परन्तु नहीं किया जाता है। फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्पित संगठन भी अहर्निश प्राणवायु फूंकता रहता है। आरएसएस ने बंगाल में चुनाव को केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि बंगाली हिंदुओं के अस्तित्व की लड़ाई के रूप में पेश किया। बैठकों में हिंदुओं को एकजुट होने और अपनी संस्कृति व अस्मिता के लिए वोट करने की अपील की। इन पांच राज्यों के परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चुनावी चाणक्य अमित शाह के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक आधुनिकीकरण और मुखर कूटनीति में शामिल भारत के व्याकरण को बदल देने का जनादेश है। ये चुनाव केवल क्षेत्रीय जनादेश नहीं थे, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पहली बड़ी चुनावी गणना थी, जो 2029 की नींव रखने का संकेत दे रही है। लिहाजा भाजपा के बंगाल की जीत के बाद गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा को भगवामय करने के बाद अब भाजपा, दक्षिण में भी विजयरथ को आगे बढ़ाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
क्योंकि: “जो सपनों के पीछे पागल सा चलता है, वही एक दिन कामयाबी को पकड़ता है”