नारी शक्ति वंदन, मिलकर करें अभिनंदन

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प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
आज से संसद के दोनों सदनों का ऐतिहासिक तीन दिवसीय सत्र प्रारंभ हो रहा है। आजादी के बाद कई बार लोकसभा और राज्यसभा के विशेष सत्र आहूत किए जाते रहे हैं। लेकिन, मेरी व्यक्तिगत राय है कि यह सत्र भारत के मुस्तकबिल को लेकर एक बड़े बदलाव की वजह बनेगा, लिहाजा यह एतिहासिक सत्र होगा। सरकार की मंशा है कि इस सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम सभी की सहमति से पारित कराते हुए देश की विधानसभाओं और लोकसभा में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व महिलाओं का सुनिश्चित किया जाए। कालांतर में भी ऐसी ही कोशिशें विभिन्न सरकारों द्वारा की जाती रही हैं लेकिन, कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई। केंद्र की भाजपा के नेतृत्व की एनडीए गठबंधन की सरकार ने सितंबर 2023 में 128वां संवैधानिक संशोधन विधेयक प्रस्तुत करते हुए आधी आबादी को जनप्रतिनिधित्व में पूरा अवसर देने की अपनी मंशा जाहिर की थी। वैसे तो यह कानून साल 2023 में ही पास हो चुका है, लेकिन अब तक इसे लागू नहीं किया गया है। इस कानून के अंतर्गत महिलाओं को लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में कम से कम 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई है। ताकि राजनीति में भी महिलाएं पुरुषों के बराबर आ सके। अभी लोकसभा में केवल 14 प्रतिशत महिलाएं हैं। हालांकि पंचायती राज में संशोधन कर कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने स्थानीय मध्य स्वर्णिम निकायों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के लिए कानून बनाया था। उसी के तहत पंचायती राज संस्थाओं में अब महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन, जब बात देश की सबसे बड़ी पंचायत, विधानसभाओं और लोकसभा की आती है तो आज भी नारी तू नारायणी बोलने वाले टिकट देने के मामले में कन्नी काटते हैं। हालांकि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का कमोबेश 2023 में समर्थन लगभग सभी दलों ने किया था। तब इसे शीघ्र लागू किये जाने की मांग पुरजोर तरीके से की गई। अब, जब सरकार इस अधिनियम को लागू कर 2029 से ही अमलीजामा पहनाने का संकल्प दिखा रही है, तो तकनीकी खामियों को गिनाकर इसके विरोध की भी सुगबुगाहटें सुनाई दे रहीं हैं। राजनैतिक दलों की अपनी मजबूरियां हैं, समझी भी जा सकती हैं। वैचारिक और व्यवहारिक कठिनाइयां भी स्वीकार्य हैं, लेकिन केवल विरोध के विरोध उचित नहीं होगा। संविधान के आर्टिकल 368 के अनुसार, इस संशोधन के लिए ‘विशेष बहुमत’ की जरूरत होगी, चूंकि यह अधिनियम संविधान संशोधन है लिहाजा दो – तिहाई बहुमत से पारित होने पर ही प्रावधान में समाहित होगा।
केंद्र सरकार के पास अभी दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत नहीं है लिहाजा विपक्ष के समन्वय और सकारात्मक सहयोग के बिना नारी शक्ति वंदन अधिनियम पूर्णाकार नहीं ले पाएगा। मुख्य विपक्षी कांग्रेस का तर्क कि इस बिल को लाने से पहले हितधारकों से सही तरह से सलाह नहीं ली गई। कांग्रेस का कहना है कि इस बिल के पारदर्शिता की कमी है, जिसके चलते संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही परिसीमन के दौरान सीटों के संतुलन को लेकर स्पष्टता नहीं है। वहीँ यूपीए शासनकाल में ही भारत की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में सुशोभित प्रतिभा पाटिल जी मानना है कि यह बिल एक ऐतिहासिक और सकारात्मक कदम है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से कानून बनाने की प्रक्रिया और मजबूत होगी, नीतियां ज्यादा संतुलित और संवेदनशील होंगी और आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं को प्रेरणा मिलेगी। मतलब साफ है समाज का एक बड़ा तबका और बहुत से सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाएं भी चाहती हैं कि यह बिल अब बिना किसी देरी के पास किया जाए। ऐसे में भारत की विपक्षी पार्टियों को बीजेपी और सरकार की नहीं तो कम से कम जनभावनाओं का सामान तो करना भी चाहिए। खासतौर पर कांग्रेस जिसके अब तक के इतिहास में पांच महिलाएं एनी बेसेंट (1917), सरोजिनी नायडू (1925), नेली सेनगुप्ता (1933), इंदिरा गांधी (1960, 1978, 1983), सोनिया गांधी (1998) से सबसे लंबे समय तक रहने वाली महिला अध्यक्ष थीं, इन्हे तो कम से कम सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित कराने आगे आना ही चाहिए। विपक्ष का यह कथन निराधार तो नहीं कि सरकार इस समय महिला आरक्षण लागू कराने वाली पहल से अपने राजनीतिक हित साधना चाहती है, लेकिन आम तौर पर सरकारों और दलों के तो हर फैसले राजनीतिक हित ध्यान में रखकर ही लिए जाते हैं। ऐसे में अच्छा यह होगा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का संशोधित प्रारूप सामने आने के बाद ही सवाल और संदेह खड़े किए जाएं। समस्या यह है कि मोदी सरकार कोई भी पहल करती है तो विपक्ष तत्काल उसकी नीयत पर सवाल खड़े करने लगता है। आलोचना-निंदा अनुमान और आशंका के आधार पर नहीं होनी चाहिए। लिहाजा, उम्मीद यही की जानी चाहिए कि भारत में यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते की मूल भावना को आत्मसात करने और नारी को बराबरी का हक देने की इस कोशिश में सभी दल नारी शक्ति के वंदन को मिलकर करेंगे अभिनंदन… वरना तो पुष्यमित्र उपाध्याय ने लिखा ही था – छोडो मेहँदी खड्ग संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे सुनो दोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे।