व्यवस्था मर गई, लाश मत गिनिए

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विशेष संपादकीय (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है । रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है । लोक अभिव्यक्ति को शब्दों में पिरोकर भावना में प्रकट करने वाले दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां पूरे दिन भर से जेहन में चल रही थीं। सबसे पहले ब्रेकिंग देने की कोशिश में समाचार (वैसे इन्हे इंफोटेनमेंट) चैनल कहा जाता है , इंदौर के दु:खद हादसे में काल-कवलित हो चुके लोगों की संख्या बता रहे थे। मौतों की संख्या भी बेमेल थी,सब की अलग- अलग। मेरा साफ़ मानना है कि इंदौर में व्यवस्था की मौत हुई है,ऐसे में लाशों की संख्या को क्यों गिनना ? एक -दो ‘बॉडी’ के घट-बढ़ होने से व्यवस्था के मौत के मातम को खुशहाली में नहीं बदला जा सकता। मैं भरे मन से इसे व्यवस्था की मौत इसलिए लिखने का प्रयास इसलिए कर पा रहा हूं कि जिस मंत्री को मुख्यमंत्री के सूट-बूट दिख जाते हैं,और अपनी लंगोट पर कोफ़्त होती है,उसी की विधानसभा में पीने का साफ़ पानी नहीं मिलने से अकाल मृत्यु,दरअसल व्यवस्था की ही मौत है। इंदौर की घटना पीने की पाइप लाइन में सीवर की गंदगी के मिलने से हुई है । यह प्रक्रिया प्रत्येक उस शहर में हो रही है , जहां सीवरेज की पाइपलाइन डाली गई है । जो इंदौर में हुआ है वह धीमी गति से प्रत्येक शहर में घट रहा है । आज नहीं तो कल इस घटना की सारे शहरो में? पुनरावृति होगी । प्रत्येक शहर की सीवरेज योजना में निम्न गुणवत्ता के पाइप का उपयोग किया गया , जिसके बारीक-बारीक छिद्रों से सीवर की गंदगी बाहर निकल कर पीने की पाइप लाइन में मिल रही है । पाइप के जॉइंट में किसी भी प्रकार का केमिकल लगाकर उसे एयर टाइट नहीं करने से सीवर का लिकेज हमेशा बना रहता है । सीवरेज की पाइप लाइन , पीने के पानी की पाइपलाइन से 4-6 फीट दूर होना चाहिए , इस नियम का कहीं भी पालन नहीं किया गया । अधिकांश जगह सीवरेज की लाइन और पानी की लाइन साथ-साथ चल रही है या ऊपर नीचे चल रही है तथा सीवरेज की पाइप लाइन की गहराई भी नियमानुसार नहीं है । एवं पाइपलाइन के नीचे और ऊपर गिट्टी और सीमेंट का भराव भी नहीं किया गया है । खुदाई के समय जो मिट्टी निकाली थी , उसी को वापस भराव में डाल दिया गया है । माना कि यह योजना आपके खाते में मिली है,लेकिन गुणवत्ता नियंत्रण करने से रोका किसने था ?भागीरथपुरा बस्ती में जो भी दुखद हुआ ,वो एक दो दिन में होने वाली स्थिति नहीं थी। रहवासियों का भी कहना है कि पिछले दो वर्षों से पीने लायक पानी के उनके आवाजों को अनसुना किया जाता रहा है। साल 2025 में घटी घटनाओं के नजरिए से इंदौर को देखा जाए तो यही कहा जा सकता है कि जैसे इस सपनों के शहर को ग्रहण सा लग गया है। सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में चूहे नवजात बच्चों को कुतर देते हैं। नो एंट्री में ट्रक के घुसने से हुआ अप्रत्याशित हादसा भी यह शहर कभी भूल नहीं पाएगा। अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी के साथ दुव्र्यवहार की घटना से भी इंदौर की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इंदौरियों की जागरुकता मिसाल है, इस सबके बावजूद दूषित पानी से सबसे स्वच्छ शहर में मौतें होना केवल इंदौर के लिए नहीं मध्यप्रदेश के लिए कलंक है।इन सब के बीच वरिष्ठतम मंत्री ही नहीं विभागीय मंत्री और स्थानीय विधायक का सवालों पर गुस्सा निकालते हुए अमर्यादित शब्दों का प्रयोग व्यवस्था की मौत का ही हिस्सा तो है। वो 14 ‘बॉडी’ जिनके मुआवजा की दो लाख की राशि मुकरऱ्र कर दी गई है ,यदि जिम्मेदारों को जिम्मेदारी का एहसास होता तो वर्षों से नसों में खौलता रक्त यूं ही ठंडा नहीं पद गया होता। मैंने पहले भी लिखा था ‘चक्र गहो यदुलाल’ आज फिर लिख रहा हूं ,इन मौतों को केवल घटना की नजर से मत देखिए ,क्योंकि – कुछ तो मजबूरियां रही होंगी