कल तो केवल कैलेंडर बदलेगा…

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प्रसंगवश (मध्य स्वर्णिम): सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
कितना भी पकड़ो फिसलता जरूर है , ये वक्त है साहब बदलता जरूर है।
लिहाजा कल अंग्रेजी कैलेंडर के पन्ने भी बदल जाएंगे, दीवार पर टंगे 2025 के स्थान पर 2026 का कैलेंडर अस्तित्व में आ जाएगा। 2025 का कैलेंडर बेकाम होकर कहीं कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा। वैसे विश्व के बहुसंख्य देश अंग्रेजियत और बीसी/डीसी को ही मानते हैं। लिहाजा सृष्टि निर्माण की गणना इन्ही पाश्चात्य देशों के अनुसार चल रही है। लेकिन,सनातनी तो चैत्र प्रतिपदा,नवसंवत्सर से ही नूतन वर्ष का अभिनन्दन करते हैं। भारतीय काल- गणना खगोलीय और ऋतु परिवर्तनों पर आधारित है, जबकि 1 जनवरी केवल कैलेंडर का बदलाव है।जनवरी को नव वर्ष मनाना पश्चिमी संस्कृति की नकल माना जाता है। भारत की अपनी समृद्ध काल-गणना है, जिसके अनुसार नव वर्ष (विक्रम संवत) आमतौर पर मार्च-अप्रैल (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) में शुरू होता है।जनवरी में प्रकृति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिखता। इसके विपरीत, चैत्र में वसंत ऋतु आती है, पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं और प्रकृति नवजीवन का स्वागत करती है।रोम के देवता ‘जेनस’ के नाम पर जनवरी का नामकरण हुआ है, जो शुरुआत और अंत के देवता माने जाते हैं। जबकि हम सनातनी ब्रम्हा,विष्णु,महेश को ही पालक और संहारक के रूप में आदिकाल से स्वीकार करते आ रहे हैं। बहरहाल,कल से तो केवल कैलेंडर ही बदलेगा … बदलाव सोच में हो तो बात बने।2025 में जो कुछ हासिल नहीं हुआ 2026 में उसको हासिल करने मन,वचन और कर्म से प्रयास हों तो बात बने। देश में कोई भी भूखा नहीं सोए,कोई भी आतंक का शिकार न हो,स्वच्छ हवा,पानी मिलने की गारंटी हो तो बात बने। दरअसल,साल दर साल हम पहले कैलेंडर के पन्ने पलटते हैं,बाद में कैलेंडर ही बदल देते हैं लेकिन हसरतें चट्टान की तरह एक ही जगह पर खड़ी रहती हैं टस से मस नहीं होती। पिछले कुछ सालों में देश में बदलाव के बयार की अनुभूति हो रही है। नव चेतना का विस्तार हो रहा है किन्तु समाज में अलग तरह की विषाक्तता भी घुल रही है। इसका फायदा किसको और कितना होगा ?अभी यह कह पाना मुश्किल है। विकास की इस अंधी दौड़ में भले ही हम मंगल ग्रह तक पहुँच गए हों लेकिन, सोच आदिमयुगीन होती जा रही है। सहनशक्ति ख़त्म होती जा रही, बात बात में प्रतिकार,प्रतिशोध में तब्दील हो रहा है। पागलपन की हद तक नकारात्मकता हावी होने लगी है। इन सभी के बावजूद ये भी सच है कि युवा नव ऊर्जा से भरे हुए हैं। योग,संयोग और प्रयोग के माध्यम से देश की ख्याति को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर रहे हैं। खेल का मैदान हो या व्यापार, नेतृत्व हो या अविष्कार प्रगति के नए सोपान गढ़े जा रहे हैं। राजनीति भी करवट लेते दिखाई दे रही है। अब युवा नेतृत्व कमान संभालते दिखाई दे रहे हैं। यह बात अलग है की अनुभव ही शत-प्रतिशत परिणाम की गारंटी है। देश की राजधानी में मौसम खराब ही रहा चाहे वो राजनीति की बात हो या पर्यावरण की। देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने राजनैतिक द्वन्द से बाहर निकल ही नहीं पा रही है और इसी उहापोह में इतनी नकारात्मक हो गई अब जनता उनकी किसी भी बात पर भरोसा कर ही नहीं पा रही है। दूसरी तरफ इस साल देश की क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के लिए भी नुकसानदायक ही रहा। लगता है ,देश एक बार फिर द्विदलीय व्यवस्था की तरफ आगे बढ़ रहा है और क्षेत्रीय दल सिमट कर इकाई में पहुंचते जा रहे हैं। खैर,राजनीति पर लिखने और छोडऩे को बहुत है। अभी तो मामला केवल कैलेंडर बदलने का ही है,लिहाजा बदलाव से क्या अर्जित होगा ? चिंतन इस पर किया जाना चाहिए। कुंवर नारायण जी के शब्दों में-
ग़लतियाँ ही ग़लतियाँ थी उसमें हिसाब-किताब की, फिर भी लगा,
गलियाँ ही गलियाँ हैं उसमें अनेक संभावनाओं की