‘नितिन’ की नियुक्ति से ‘नवीन’ हुई राष्ट्रीय बीजेपी

0

विशेष खबर (दैनिक मध्य स्वर्णिम): बीजेपी के लिए उसके नए अध्यक्ष का पद काफी अहम माना जाता है। खासकर अगले साल पश्चिम बंगाल और उसके बाद 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को देखते हुए, यह ज़िम्मेदारी काफ़ी बड़ी होने वाली है। बीजेपी में कभी किसी अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए वोटिंग नहीं हुई है। पार्टी की कोशिश ये होती है कि बीजेपी और संघ के लोग आपस में विचार विमर्श करते हैं और पार्टी की ज़रूरत को ध्यान में रखकर अध्यक्ष का चयन किया जाता है। जब नितिन गडगरी को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था, तो उनकी भी राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका नहीं थी। अब तो बीजेपी भविष्य के लिए अपना नेतृत्व तैयार कर रही है, जिसमें कांग्रेस काफी पीछे है। हालाँकि नितिन गडकरी को आरएसएस का करीबी माना जाता है। जबकि नितिन नबीन की संघ से कोई दूरी भले ही न हो, लेकिन उन्हें संघ का करीबी भी नहीं समझा जाता है। नितिन गडकरी का दौर बीजेपी में आरएसएस के करीबियों का दौर था। अब का युग संघ के करीबी का युग नहीं है। अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह के करीबी का युग आ गया है। माना जाता है कि नितिन नबीन अपने सियासी करियर में कभी किसी विवाद से नहीं जुड़े हैं और इसलिए बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने उन पर भरोसा दिखाया है। नितिन नबीन को पार्टी का वर्किंग प्रेसिडेंट बनाकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दिखा दिया है कि पार्टी के मामले में वो आरएसएस के मुकाबले अपर हैंड रखते हैं। बीजेपी बहुत दूर की सोचती है वो समय गँवाना नहीं चाहती। उसके सामने अभी सवाल है कि नीतीश के बाद बिहार में कौन? ऐसी बात कोई सोच भी नहीं सकता। बीजेपी फ़िलहाल कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर नितिन सि नबीन को परखेगी और पूरी तरह पुख्ता होने के बाद करीब डेढ़ ल महीने के बाद स्थायी अध्यक्ष के तौर पर उनका नाम घोषित कर देगी। अन्य दलों में जहां नेतृत्व परिवर्तन एक जटिल विषय है, इसके ठीक उलट बीजेपी ने इसे बेहद सहज बनाकर दिखाया है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह जैसे बड़े चेहरों की जगह मोहन यादव, भजनलाल शर्मा और विष्णु देव साय जैसे अपेक्षाकृत नए नेताओं को आगे लाकर नेतृत्व चुनने की शक्ति को केंद्रीय नेतृत्व और संसदीय बोर्ड के हाथ में मजबूती से केंद्रित किया है। बीजेपी चाहती है कि किसी भी स्तर पर चेहरा बदलने पर भी पार्टी लाइन और नीतियों में मध्य स्वर्णिम निरंतरता बनी रहे। राष्ट्रीय स्तर पर भी अमित शाह से जेपी नड्डा और जेपी नड्डे से नितिन नबीन को संगठन की कमान सौंपकर बीजेपी ने इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। देश और दुनिया की सबसे बड़ी सियासी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी लगातार नई लीडरशिप पर फोकस करते हुए फैसले ले रही है। ये फैसले सिर्फ संगठन स्तर पर नहीं, बल्कि सरकार स्तर पर भी लिए जा रहे हैं। हरियाणा में नायब सिंह सैनी, मध्य प्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजन लाल शर्मा, दिल्ली में रेखा गुप्ता और ओडिशा में मोहन चरण माझी इसका ताजा उदाहरण हैं। बीजेपी न सिर्फ अगली पीढ़ी की लीडरशिप पर ही काम रही है, विपक्षी पार्टियों की सोच से कही आगे की रणनीति पर काम कर रही है। भविष्य की लीडरशिप तैयार करने पर बीजेपी का कितना फोकस है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आरएसएस की स्टूडेंट विंग या कहें कि संघ की नर्सरी- एबीवीपी से आने वाले युवाओं को संगठन और सरकार में जिम्मेदारी वाली भूमिकाएं दी जा रही हैं। बीजेपी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव रोहित चहल, यूपी में योगी आदित्यनाथ के पहले कार्यकाल में उनके ओएसडी रहे अभिषेक कौशिक, यूपी बीजेपी के पिछले अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी के सहयोगी नितेश तोमर, यूपी के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के सहयोगी राहुल सारस्वत इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। ये सभी कुछ समय पहले तक छात्र राजनीति राजनीति में एक्टिव थे। नरेंद्र मोदी की बीजेपी लगातार बीजेपी का दायरा बढ़ा रही है। पार्टी ओबीसी समुदाय पर फोकस कर रही है। इसी कड़ी में ओबीसी समुदाय से आने वाले कई नेताओं को संगठन और सरकार में जिम्मेदारी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसके परंपरागत जनरल कैटेगरी के कैडर को नजरअंदाज किया जा रहा है। बीजेपी लगातार ओबीसी और जनरल कैटेगरी के बीच बैलेंस बनाकर चल रही है। पार्टी ने यूपी जैसे बड़े राज्य सहित कई अन्य राज्यों में ओबीसी कैटेगरी से आने वाले नेताओं को संगठन की कमान दी है तो वहीं कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर स्पष्ट कर दिया है कि वह सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति पर काम करेगी।