चक्र गहो यदुलाल…

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प्रसंगवश: सुनील दत्त तिवारी (मो. 9713289999)
माखन और बांसुरी छोड़ो, चक्र गहो नंदलाल
उक्त पंक्तियां मेरे अग्रज और भारतीय प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुके अधिकारी,शहडोल को फुटबाल क्रांति के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने वाले वाले श्रीयुत राजीव शर्मा की हैं। तब वे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हुआ करते थे, और तत्कालीन सत्तानायकों के छर्रे-कटोरियों की क्रिया कलाप से खिन्न थे। तब उन्होंने यह कविता लिखी भी और पढ़ी भी। इस सन्दर्भ में उनकी लाइन का उपयोग इसलिए कर रहा हूं,क्योंकि आज ही के दिन 11 दिसंबर 2023 मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल ने डॉ. मोहन यादव को अपना नेता चुना था। 13 दिसंबर को उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। लिहाजा, आज ही वह दिन है जब दो वर्षों के कार्यकाल को कसौटी पर कसा जाना चाहिए। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इन दो वर्षों के दौरान डॉ.मोहन यादव ने कुशल,परिपक्व और संवेदनशील राजनेता के रूप में स्वयं को स्थापित भी किया है और कई प्रतिमान भी गढ़े हैं। सदियों से चली आ रही कई बंदिशों को तोड़ा है तो खुद ही नवाचार के नए पथ का सृजन भी किया है। मोहन की मनमोहक मुस्कान के पीछे प्रतिबद्धता और कर्मठता का बेजोड़ संगम है। शासन व्यवस्था को राजधानी से उठाकर प्रदेश के दूरस्थ जिलों तक पहुंचाने का अभिनव प्रयोग इसी कार्यकाल में हुआ। ‘विरासत से विकास’ का मूल मन्त्र अंगीकार कर सांस्कृतिक अवचेतन समाज की नवचेतना को झंकृत करने का जो अभियान शुरू हुआ है,उससे अभिमान की गर्वोक्ति होती है। मुझे वह दिन भी बहुत अच्छे से याद है जब 2016 में तत्कालीन प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री से मैंने केन – बेतवा लिंक परियोजना में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगाए जा रहे अड़ंगे पर सवाल पूछ लिया था। मंत्री ने मुझे यह अहसास कराने में कतई संकोच नहीं किया कि मैंने मधुमक्खी के छत्ते में जैसे कंकर फेंक दिया हो। खैर,उसी असाध्य परियोजना वह भी एक नहीं तीन – तीन नदियों को जोडऩे का भागीरथ प्रयास डॉ. मोहन और उनकी टीम ने एक झटके में कर दिखाया। प्रदेश में पहली बार निवेश को लेकर जो जिजीविषा चारों प्रहर , सरकार के द्वारा दिखाई जा रही है वह अभिनंदनीय है। समग्र विकास की अवधारणा से आसक्त नीतियां ऐसी बनाई कि अब लगभग हर संभाग में औद्योगिक क्लस्टर बन रहे हैं,रोजगार का सृजन भी हो रहा है। पर्यावरण से लेकर जल संरक्षण, जैव विविधता से लेकर पारिस्थितिकी तंत्र, हीरों से लेकर महावीरों और जनजातीय गौरव से लेकर जननायकों की आभामंडल को फलक पर पुनर्जागृत करने की ललक एक विजनरी मुख्यमंत्री की ही हो सकती है। बीता हुआ दो साल उपलब्धियों के हिसाब से रीता (खाली ) हुआ बेशक नहीं है। इन सालों में एक तरफ पुलिस कर्मचारियों पर छुटपुट हमले की घटनाएं हुई हैं लेकिन दूसरी तरफ यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि रिश्वतखोरों को मोहन तंत्र बिल्कुल भी नहीं बख्श रहा है, जिसे एक स्वस्थ व स्वच्छ कदम के तौर पर भी देखा जाना चाहिए।लेकिन, आगे के दो साल की चुनौतियां बड़ी हैं। दो साल इसलिए कि अंतिम का एक साल तो सिंहस्थ और चुनाव का वर्ष रहेगा जहां सरकार की सम्पूर्ण सामथ्र्य और नेतृत्व को तौला जाएगा। डॉ. मोहन यादव यदुवंशी हैं लिहाजा श्रीकृष्ण ही उनके आराध्य होंगे,बिना झिझक लिख सकता हूं। कृष्ण के गीता का मर्म शक्ति के साथ संतुलन का रहा है। मैंने शीर्षक ‘चक्र गहो यदुलाल’ इसी सन्दर्भ के लिए लिखा है। इन दो वर्षों में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव ने ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’ के रास्ते पर चलते हुए समदर्शी शासक की अपनी छवि गढ़ी है। कई बार उदारता का अतिरेक भी दिखाई दिया, मंत्रिमंडल के वरिष्ठ साथियों द्वारा स्वेच्छाचारिता में दिए गए बयान हों या फिर संगठन के कार्यकर्ताओं के अशोभनीय व्यवहार या वरिष्ठ अधिकारियों की मनमर्जियां हों,इन सभी का प्रतिकूल प्रभाव डॉ.मोहन यादव की छवि पर नहीं पड़ा हो,ऐसा न कहना बेमानी होगी। संतोष वर्मा जैसे अधिकारी ने जिस प्रकार ठहरे हुए शांत पानी में समाज वैमनस्यता का कंकड़ फेंका है वह अक्षम्य होना चाहिए। हालांकि इस पर निर्णय डीओपीटी को करना है,लेकिन बहुसंख्य तो उम्मीद मुख्यमंत्री से ही लगाकर बैठे हैं। आने वाले समय में मंत्रिमंडल विस्तार के कयास भी लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है विभागीय समीक्षा में लंगड़े घोड़ों को चिन्हित कर लिया गया है। यदि ऐसा है रथ के दोनों पहियों को साध लेने के साथ आगे बढऩे की नैसर्गिक प्रतिभा भी दिखाई देगी। बहरहाल, जो बीत गई वो बात गई लेकिन आने वाले समय का सदुपयोग और बेहतर होगा। डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में संकल्पित मध्यप्रदेश, विकसित भारत के निर्माण की पटकथा लिखेगा आज के मौके पर ऐसी कामना तो की ही जानी चाहिए। क्योंकि भारत रत्न पंडित अटल जी ने लिखा ही था- “बाधाएं आती हैं आएं, घिरें प्रलय की घोर घटाएं, पावों के नीचे अंगारे,सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं, निज हाथों में हंसते-हंसते,आग लगाकर जलना होगा. कदम मिलाकर चलना होगा।”