भोपाल (मध्य स्वर्णिम): मध्य प्रदेश में एक नया सियासी विवाद खड़ा हो गया है। 2023 विधानसभा चुनावों से ठीक पहले नौ समाज कल्याण बोर्ड गठित किए गए थे। विधानसभा में सरकार की तरफ से पेश दस्तावेजों से पता चला है कि दो साल तक ये बोर्ड बिना काम के रहे हैं। इन बोडों को काम के लिए एक रुपए भी नहीं दिए गए। इन बोर्डों में न तो कोई काम हुआ, न ही उस समुदाय के किसी व्यक्ति को इससे फायदा पहुंचा। लेकिन बोर्ड के अध्यक्ष बने लोगों को सरकारी सुविधाएं और भत्ते मिलते रहे हैं। दरअसल, इस बात का खुलासा तब हुआ जब विधायक ग्रेवाल ने सरकार से इन समुदाय-विशिष्ट कल्याण बोर्डों के कामकाज, बैठकों, बजट और नतीजों के बारे में जानकारी मांगी थी। राज्य मंत्री गौतम टेटवाल ने विधानसभा में इसे लेकर लिखित जानकारी दी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अक्टूबर 2023 में इन नौ बोर्डों का गठन किया था। इन बोडों में प्रमुख जातियों और नेताओं को अध्यक्ष और सदस्य बनाया गया। इनमें से कई लोगों को मंत्री पद का भी दर्जा मिला। वहीं, एमपी सरकार ने स्वीकार किया कि 2023 में इन सभी नौ बोर्डों के संचालन के लिए कुल 8.34 करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया गया था। लेकिन, किसी भी बोर्ड को एक पैसा भी जारी नहीं किया गया। नतीजतन, किसी भी योजना के तहत कोई भी लाभार्थी पहचाना नहीं गया, चुना नहीं गया और न ही कोई सहायता प्रदान की गई। मंत्री ने साफ तौर पर कहा कि लाभार्थियों, पात्रता मानदंडों या मिले लाभों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि दो सालों में बोडों के तहत कोई भी गतिविधि नहीं हुई। प्रशासनिक कामकाज की बात करें तो, जवाब से पता चला कि किसी भी बोर्ड ने अपने कार्यकाल के दौरान एक भी जिला स्तरीय बैठक आयोजित नहीं की। केवल कुछ राज्य-स्तरीय बैठकें हुई विश्वकर्मा बोर्ड के लिए तीन, वीर तेजाजी बोर्ड के लिए एक, जय मीनेश बोर्ड के लिए तीन, और इसी तरह। तीन बोर्डों ने तो एक भी बैठक नहीं की। वहीं, महाराणा प्रताप बोर्ड में कभी अध्यक्ष या सचिव नियुक्त नहीं हुआ। तेलघानी और जय मीनेश बोर्ड में तो कोई सदस्य ही नियुक्त नहीं हुआ। रज्जाक और वीर तेजाजी बोर्ड में चार सदस्यों की जगह सिर्फ एक-एक सदस्य था। आउटसोर्स कर्मचारियों को नियुक्ति के 18 महीने बाद काम पर रखा गया और फिर कुछ ही महीनों में उन्हें हटा दिया गया।




