
ग्राउंड रिपोर्ट (मध्य स्वर्णिम): राकेश व्यास (मो. 9977701999)
दतिया का उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का रेफरेंडम नहीं है। यह एक पूर्व में हारे हुए विधायक की पार्टी को जिताने की कवायद है। शायद चुनाव के परिणाम स्थानीय राजनीति के साथ-साथ प्रदेश की राजनीतिक दिशा, संगठनात्मक ताकत और जनता के बदलते मनोविज्ञान को समझने का भी अवसर देंगे। चुनावी मैदान में भले ही विभिन्न दल अपनी-अपनी ताकत और दावों के साथ उतर रहे हों, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाए तो भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला खुद के अपने संगठन और कार्यकर्ताओं से होता दिख रहा हैं। हालांकि यह भी सही है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत भी उसका मजबूत संगठन, बूथ स्तर तक फैला हुआ नेटवर्क और सत्ता पक्ष के रूप में उपलब्ध राजनीतिक संसाधन हैं। इसके अलावा प्रदेश में भाजपा के पक्ष में बने राजनीतिक माहौल को भुनाने में शायद ही पार्टी को ज्यादा मेहनत करनी पड़े। यदि दतिया में पार्टी यदि अपने संगठन को पूरी तरह सक्रिय रखने में सफल रहती है और स्थानीय समीकरणों को साध लेती है, तो उसके लिए चुनावी राह अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। इसके विपरीत कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि अपने भीतर की कमजोरियों से निपटने की भी है। कांग्रेस यदि आपसी मतभेद, गुटबाजी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एकजुट होकर चुनाव लड़े, तभी वह भाजपा के मजबूत संगठन को चुनौती दे सकता है। केवल सरकार विरोधी माहौल या नारों के भरोसे चुनाव जीतना अब आसान नहीं है। जनता अब उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दों और क्षेत्र के विकास से जुड़े ठोस सवालों को भी गंभीरता से देख रही है। दतिया का मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक है। यहां चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों से तय नहीं होता। सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, युवाओं की अपेक्षाएं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए जो दल इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के सामने रख पाएगा, उसे निश्चित रूप से लाभमिलेगा। हालांकि भाजपा की स्थिति मजबूत जरूर है, लेकिन चुनाव को एकतरफा मान लेना राजनीतिक भूल होगी। उपचुनावों में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की छवि और मतदान के दिन मतदाताओं का उत्साह कई बार पूरे चुनावी गणित को बदल देता है। भाजपा को अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए संगठन के साथ-साथ जनता से सीधा संवाद भी मजबूत करना होगा। दतिया उपचुनाव का परिणाम केवल एक विधायक का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का संकेत भी देगा कि जनता स्थानीय नेतृत्व और राजनीतिक दलों के प्रति किस प्रकार का भरोसा रखती है। मौजूदा परिस्थितियों में भाजपा बढ़त की स्थिति में दिखाई तो देती है, लेकिन मान-मनौव्वल और टिकट के मजबूत दावेदार को हाशिए पर लाकर आलाकमान ने जो संकेत दिए हैं, उसपर अंतिम फैसला दतिया की जनता ही करेगी। चुनाव का असली सवाल यही है, क्या कांग्रेस भाजपा की मजबूत राजनीतिक जमीन में सेंध लगा पायेगी, या दतिया की जनता इस बार भाजपा के पक्ष में अपना फैसला सुनाएगी। दतिया उपचुनाव को बीजेपी पूरी शिद्दत से लड़ रही है। केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिवप्रकाश जी, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल को भी मोर्चे पर लगा दिया है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह भी टिकट की घोषणा के बाद से ही कैंप किए हुए हैं। शायद यही वजह कि टिकट न मिलने की वजह से नाराज, नरोत्तम समर्थक कार्यकर्ता अब एक ही जाजम पर बैठकर आशुतोष तिवारी जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। संभव है, 3 अगस्त को परिणाम में यह लिखा होगा कि वाकई चुनाव लड़ना और जीतने की कला तो बीजेपी संगठन के पास ही है।
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